मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर क्या कहते हैं हमारे वेद पुराण
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वेदों में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिससे यह मालूम होता है कि उन दिनों महिलाओं को पुरुषों के समान ही हर क्षेत्र में अधिकार प्राप्त था। यहां तक ही महिलाएं पुरुषों से समान ऋषि परंपरा को अपनाकर गुरूकुल तक चला सकती थी। वैदिक समाज में पुत्र के समान ही पुत्री को स्नेह-दुलार एवं आदर-सम्मान दिया जाता था। (श. 3/31/2) परिवार में कन्याएं अपने आदर्श गुणों को विकसित करती हुई प्रायः माता के अनुशासन में रहती थी।
माता के साथ वे गृहकार्यों को सीखती थी व उनको सहायता देती थी।(ऋ. 3/55/12) वैदिक कन्याएं कृषि कार्य में भी पिता के साथ सहयोग करती थी। अपाला को अपने पिता के खेतों में अच्छी फसल के लिए इन्द्र से याचना करते हुए चित्रित किया गया है। (ऋ. 8/81/5-13) ऋग्वेद में कन्या को उच्च स्थान प्राप्त था, जिसका उदाहरण ‘विसूनृता ददृशेदीयते घृतम्’ (ऋ. 1/135/7) अर्थात् जहां घृत बहता है, वहां हर्ष से प्रफुल्लित कुमारी देखी जाती है। इस तरह कन्याओं का सम्मान होने से वे सन्तुष्ट होकर अनेक समाजिक कार्यों में सहयोग प्रदान करती थी।
ऋग्वेद में पुत्र एवं पुत्री के संबंध में विचार
वैदिक काल में कन्याओं को शुभ तथा विशेष शक्ति से युक्त माना जाता था। इसकी
पुष्टि उजस् को दिव की पुत्री निर्देशित करने से होती है। ऋग्वेद में
पुत्र एवं पुत्री के दीर्घायु कामना का भी उल्लेख आता है। (ऋ. 4/31/8)।
ऋग्वेद
में प्रभूत संख्या में वाणों को धारण करने वाले त्रषुधि की प्रशंसा ‘अनेक
पुत्रियों के पिता’ कहकर की गई है। (ऋ. 6/75/5)। अन्यत्र पुत्र को पिता के
सत्कार्यों का कर्त्ता और पुत्री को आदर करने योग्य कहा गया है।
कौषीतकि
ब्राह्मण में एक कुमारी गंधर्व गृहीत अग्निहोत्र में पारंगत बतायी गयी है।
(कौ.ब्रा.2/9) बालिकाओं के लिए बालकों की ही भाँति शिक्षा ग्रहण करना
आवश्यक थी (अथर्व. 11/5/14)। बालिकाएं ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई विविध
विद्याओं में पारंगत होती थी। आध्यात्मिक ज्ञान के क्षेत्र में बृहस्पति
भगिनी, भुवना, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, मैना, धारिणी, संमति आदि कन्याओं
का उल्लेख आता है।
ये सभी ब्रह्मवादिनी थी। ऐसी कन्याओं का भी
उल्लेख आता है जिन्होंने तपस्या के बल पर अभीष्ट वर की प्राप्ति की, यथा
उमा, धर्मव्रता आदि। यही नहीं गृह में निवास करती हुई कन्याएं भी गृहस्थ
शिक्षा से अवगत हुआ करती थी।
जनेऊ संस्कार में स्त्री का महत्व
यज्ञ सम्पादित करने वाली नारियों में विश्ववारा का नाम सर्वप्रथम उल्लेखनीय है। वह प्रातःकाल स्वयं यज्ञ प्रारम्भ कर देती थी। (ऋ. 5/281)। कन्या द्वारा घर में यज्ञ का वर्णन वेद से प्राप्त होता है (ऋ. 8/91/1)। गृहस्थ में अर्धांगिनी के रूप में दैनिक धार्मिक कार्यों में भी नारी को प्रमुख माना जाता था। उसे दया की देवी स्वीकार किया गया है।
इसीलिए उपनयन संस्कार के समय बालक घर की स्त्रियों से ही भिक्षा माँगता था (मनु. 2/50)। राम के युवराज पद अभिषेक के समय कौशल्या ने यज्ञ संपादित किया था (रामायण 2/20/15)। बाली के सुग्रीव से युद्ध के लिए जाते समय उसकी पत्नी तारा भी यज्ञ कर रही थी। (रामायण 4/16/18)। पाण्डव जननी माता कुन्ती भी अथर्ववेद की पंडिता थी (महाभारत 3/3/5/20)।
वेदों में भेद नहीं तो अब क्यों?
पुरातन युग की नारी सुगृहिणी होने के साथ पति के सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। मनु ने स्पष्ट रूप से स्त्री को राज्य संचालन के योग्य माना है। वेद में भी स्त्री के लिए कई स्थलों पर पुरंधि शब्द का उल्लेख आता है- ‘पुरंनगरं दधातीति पुराँधि’ अर्थात्- जो नगर की रक्षा और पोषण करे।
नगरों के प्रबंधन, आंतरिक रक्षा एवं सफाई आदि ये कार्य स्त्रियां ही करती थीं। स्त्रियां सभा एवं समिति की सदस्याएं भी चुनी जाती थी। अथर्ववेद में कई स्थान पर इसका संकेत मिलता है (अथर्व. 7/38/4, 12/4/46, 12/3/52)। जिससे स्पष्ट होता है कि वैदिक युग में पुरुषों की भांति राज्य की सभा व समितियों में स्त्रियाँ भाग ले सकती थीं। वहां किसी प्रकार का विभेद नहीं था।
और जब हम हर क्षेत्र में स्त्री पुरुष समानता की बात कर रहे हैं तो ईश्वर के दरबार में भेद-भाव का क्या प्रयोजन है इस विषय पर क्या अब विचार करने की जरुरत नहीं है?
साभारः अखंड ज्योति (शांतिकुंज हरिद्वार)