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क्यों लोग एक ही बात सोच-सोच कर अपना खून जलाते रहते हैं?

Thu, 18 Dec 2014 12:15 PM IST
ओशो/अध्यात्मिक गुरु
ओशो/अध्यात्मिक गुरु Updated Thu, 18 Dec 2014 12:15 PM IST
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why we think frequently on one thing osho pravachan

जब तक विचार है तब तक आंख धुंध ये भरी है। जैसे दर्पण पर धूल जमी हो ऐसे चेतना पर विचार की पर्तें और पर्तें जमी हैं। बहुत उपाय किए गए हैं, किस तरह तुम्हें बाहर ले आया जाए; तुम्हारे विचार के वर्तुल से।

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झेन की अपनी विधि है। उस विधि को वे ‘कोआन’ कहते हैं। ‘कोआन’ का अर्थ है ऐसी पहेली, जो हल न की जा सके। और जिसे सोचते-सोचते-सोचते सोचना ही थक जाए। और तुम इतने ऊब जाओ सोचने से, इतने परेशान हो जाओ, सोचना इतना व्यर्थ मालूम पड़े कि तुम सोचना ही छोड़ दो। आसान नहीं है। क्योंकि बुद्धि जल्दी नहीं थकती। विपरीत स्थिति में भी सोचे चली जाती है।
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मैंने सुना है, मुल्ला नसरुद्दीन ने अपने एक मित्र को सड़क पर जाते देखा; पीठ की तरफ से। तेजी से कदम बढ़ाये, जाकर उसकी पीठ ठोंकी और कहा, ‘कहां खो गये थे अब्दुल। वर्षों बाद दिखाई पड़े।’ उस आदमी ने लौट कर, चैंक कर देखा। मुल्ला नसरुद्दीन ने भी उसे चैंक कर देखा और कहा, ‘हद्द हो गई! कौन सी विपत्ति आई तुम पर? पिछली बार जब मिले थे तो ठिगने थे, मोटे थे और अब अचानक लंबे और दुबले हो गये। चेहरा भी बिलकुल बदल डाला। दाढ़ी-मूंछ कब बढ़ा ली?’ उस आदमी ने कहा कि माफ करें, आप किसी और की भूल में होंगे। मेरा नाम अब्दुल्ला नहीं है।
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नसरुद्दीन ने दुबारा उसकी पीठ ठोंकी और कहा, ‘प्यारे, तो नाम भी बदल दिया!’ ऐसा विचार है। वह अपने लिए तर्क खोजता ही चला जाता है। वह अपने लिए मार्ग खोजता ही चला जाता है। तथ्य को अस्वीकार करना आसान है, भीतर की प्रक्रिया को अस्वीकार करना मुश्किल है। और करीब-करीब विचार ऐसा है, जैसा ग्रामोफोन का रिकार्ड खराब हो गया हो, और एक ही बात को दुहराता चला जाए। विचार यांत्रिक है, पुनरुक्तिपूर्ण है। और तुम वही-वही दुहराए चले जाते हो।


अगर तुम गौर से अपने विचार को देखोगे तो एक बात समझ में आ जाएगी कि बहुत ज्यादा विचार नहीं है तुम्हारे भीतर। कुछ विचार हैं जो बार-बार आते रहते हैं। एक लीक बन गई है। उसी लीक पर मन घूमता रहता है, वहीं सूई अटक गई है और रिकार्ड बजता रहता है।

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