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वेलेंटाइन्स डे मनाएं मातृ-पितृ पूजन दिवस के रूप में: आशाराम बापू

Sat, 09 Feb 2013 12:45 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Sat, 09 Feb 2013 12:45 PM IST
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valentines day celebrate with parents pooja

matri pitri प्रेम तो निर्दोष होता है। प्रेम तो परमात्मा से, अल्लाह से मिलाता है। अल्लाह कहो, गॉड कहो, भगवान कहो, परम सत्ता का ही नाम है ‘प्रेम’। परम सुख, परम चेतना का नाम है ‘प्रेम’। वही राम, रहीम और गॉड का असली स्वरूप है, इसी में मानवता का मंगल है। सच्चे प्रेम स्वभाव से केवल भारतवासियों का ही नहीं, विश्वमानव का कल्याण होगा। लेकिन शादी-विवाह के पहले, पढ़ाई के समय ही एक-दूसरे को फूल देकर युवक-युवतियाँ अपनी तबाही कर रहे हैं तो मुझे उनकी तबाही देखकर पीड़ा होती है। मानव-समाज को कहीं घाटा होता है तो मेरा दिल द्रवित हो जाता है। नारायण-नारायण...

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मेरे हृदय की व्यथा यह थी कि लोग बोलते हैं, ‘विकास का युग, विकास का युग’ लेकिन यह आज के युवक-युवतियों के लिए विनाश का युग है; ऐसा युग भूतकाल में कभी नहीं आया। वेलेंटाइन्स डे के दिन युवक-युवती एक-दूसरे को फूल देंगे, मिलेंगे तो कामुक विचार उठेंगे। उन अनजानों को नहीं पता है लेकिन डॉक्टर, वैद्य और बुद्धिमान समझ सकते हैं कि युवक-युवतियाँ एक-दूसरे को फूल देंगे, एक-दूसरे के शरीर को स्पर्श करेंगे तो सेक्सुअल केन्द्र की ऊर्जा नष्ट होगी या ऊर्ध्वगमन करेगी? यह प्रेम-दिन नहीं, युवक-युवतियों के साथ घोर जुल्म का दिन है, ‘युवाधन विनाश डे’ है।
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‘इन्नोसंटी रिपोर्ट कार्ड’ के अनुसार 28 विकसित देशों में हर साल 13 से 19 वर्ष की 12 लाख 50 हजार किशोरियाँ गर्भवती हो जाती हैं। उनमें से 5 लाख गर्भपात कराती हैं और 7 लाख 50 हजार कुँवारी माता बन जाती हैं। अमेरिका में हर साल 4 लाख 94 हजार अनाथ बच्चे जन्म लेते हैं और 30 लाख किशोर-किशोरियाँ यौन रोगों के शिकार होते हैं।
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प्रेम में और काम में बहुत फर्क है। काम कमजोर करता है और निर्दोष प्रेम बलवान बनाता है। काम में झगड़े होते हैं, तलाक होता है और प्रेम दिन-दिन बढ़ता है। प्रेम में परमात्मा की कृपा होती है और काम में विकारों की उत्तेजना होती है। काम-विकार में बाद में अशांति आती है और प्रेम में शांति बढ़ती है। प्रेम में अविनाशी और काम में नाश होना होता है। काम जड़ शरीर में, हाड़-मांस में ले आयेगा और प्रेम चैतन्य परमात्मा में ले आयेगा।

हृदय की विकारी वासनाओं को प्रेम का जामा देना, प्रेम को बदनाम करना है। काम उत्तेजना और अंधापन पैदा करता है, विकार पैदा करता है और प्रेम ऊपर के केन्द्रों में है, वह सूझबूझ पैदा करता है, नित्य नवीन रस पैदा करता है, प्राणिमात्र में अपनत्व दिखाता है। केवल हिन्दुस्तान उन्नत हो ऐसा नहीं अपितु पूरा मानव-समाज... पूरा विश्व इस काम-वासना की अंधी आँधी से बचकर संयमी, सदाचारी, स्वस्थ, सुखी व सम्मानित जीवन की राह पर चले और विश्व का मंगल हो क्योंकि हमें विरासत में वही मिला है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः... हम किसीका विरोध नहीं करते हैं परंतु कोई बेचारा राह भूला है, हमारा भाई है, फूल देकर पड़ोस की बहन को बहन कहने की लायकात नष्ट कर रहा है और बहन फूल लेकर पड़ोस के भाई की नजर से गिरकर विकारी कठपुतली बन रही है तो ऐसी बेटियों को, बेटों को सही दिशा मिले।

तू गुलाब होकर महक, तुझे जमाना जाने।

वेलेंटाइन्स डे, ‘प्रेम दिवस’ के नाम से यह बाहर की आँधी आयी है। हम विरोध करने के बजाय इसको थोड़ी दिशा दे देते हैं ताकि यहाँ की दिशा से उन लोगों का भी मंगल हो। प्रेम-दिवस मनायें लेकिन ‘मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।’ करके। इस दिन बच्चे-बच्चियाँ माता-पिता का आदर-पूजन करें और उनके सिर पर पुष्प रखें, प्रणाम करें तथा माता-पिता अपनी संतान को प्रेम करें। संतान अपने माता-पिता के गले लगे।

इससे वास्तविक प्रेम का विकास होगा। बेटे-बेटियाँ माता-पिता में ईश्वरीय अंश देखें और माता-पिता बच्चों में ईश्वरीय अंश जगायें। ॐ... ॐ... अमर आत्मा का सामर्थ्य जगायें। जैसे गणपति ने शिव-पार्वती का पूजन किया और शिव-पार्वती ने ‘ॐ सिद्धो भव, ॐ प्रसिद्धो भव, ॐ सर्वविघ्नहर्ता भव।’ - ऐसा आशीर्वाद दिया। विषय-विकारों की आँधी में न बहकर संयम-सदाचार से युक्त स्वस्थ, सुखी एवं सम्मानित जीवन जियें। अपने लिए, माता-पिता के लिए खुशहालियाँ पैदा करनेवाली सद्भावना से, संयम से आपका मंगल हो और आपसे मिलनेवाले का भी आनंद-मंगल हो।

इस दिन से रोज माता-पिता और सद्गुरु को प्रणाम करने का लेंगे संकल्प लें। माता-पिता और सद्गुरु के जीवन-अनुभव से सीख लें ताकि ‘विश्वगुरु भारत’ का संकल्प साकार हो।

साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आशारामजी आश्रम

संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से  सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं। 

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