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तुलसी विवाह से ही क्यों शुरु होते है शादी ब्याह और शुभ कार्य

Sat, 21 Nov 2015 04:28 PM IST
Updated Sat, 21 Nov 2015 04:28 PM IST
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tulsi vivaah dev pravodhani ekadashi

ऐसी परंपरा रही है कि देवप्रबोधनी एकादशी के दिन जब भगवान विष्णु चार महीने की निद्रा से जगते हैं तो तुलसी के पौधे से उनका विवाह होता है। घरों में क्यारियों में लगी तुलसी उस दिन दुल्हन की तरह सजती है और शास्त्रीय पंरपरा का या लोकरीति का पालन करने वाले लोग इस दिन तुलसी का विवाह उत्सव मनाते हैं। उत्सव पूर्णिमा तक मनाया जाता है। विश्वास किया जाता है कि उत्सव मनाने वालों के सब पाप नष्ट हो जाते।

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मान्यता है कि तुलसी और विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह करवाने वाले को कन्यादान का पुण्य प्राप्त होता है और अपार पुण्य की प्राप्ति होती है। इसलिए देव प्रबोधनी एकादशी को तुलसी विवाह उत्सव का दिन भी कहा जाता है। और इस विवाह उत्सव के बाद विवाह और दूसरे शुभ काम फिर से शुरु हो जाते हैं।
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इसदिन भगवान का विवाह होता है इसलिए इस दिन को विवाह का अबूझ मुहूर्त भी कहा जाता है यानी इस दिन बिना पंचांग देखे विवाह कार्य संपन्न किया जा सकता है।

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व‌िष्‍णु पुराण में पाप मुक्त‌ि और तुलसी व‌िवाह

tulsi vivaah dev pravodhani ekadashi

तुलसी व‌िवाह से व‌िवाह की शुरुआत के पीछे के रहस्य को जानने से पहले पुराणों में पाप नष्ट होने का अर्थ भी जान लीज‌िए क्योंक‌ि आमतौर पर पाप नष्ट होने से यह माना जाता है क‌ि आप सारे अपराधों से मुक्त हो गए। लेक‌िन व‌िष्‍णु पुराण में पाप मुक्त होने के बारे में कुछ और ही बताया गया है।

विष्णु पुराण के अनुसार पाप से मुक्त होने का अर्थ उस के संस्कारों से मुक्त होना है। किए गए पापों का परिणाम तो भुगतना ही है, उन्हें भुगतते हुए अपना इस तरह परिष्कार करना है कि पिछले कर्मों को दोहराने की जरूरत ही न पड़े।

अब जान‌िए क‌ि तुलसी व‌िवाह से पहले सभी शुभ कार्य पर रोक क्यों लगा होता है।

तुलसी व‌िवाह से पहले शादी व्याह क्यों नहीं?

tulsi vivaah dev pravodhani ekadashi

शास्‍त्रों का मत है क‌ि भगवान विष्णु समस्त मांगलिक कार्यों के साक्षी हैं। यह वर्णन भी काव्यात्मक है कि उनके विश्राम में रहते शुभ कार्य बंद रखें जाएं। समस्त शुभ कार्य  विष्णु के जाग्रत रहते हुए ही किए जाना चाहिएं। विष्णु के जागने का दिन कार्तिक शुक्ल एकादशी है। इसी दिन से सभी शुभ कार्य, विवाह, उपनयन आदि शुभ मुहूर्त देखकर प्रारंभ किए जाते हैं।

आचार्य बलदेव शास्त्री के अनुसार कार्तिक से आषाढ़ शुक्ल एकाद‍‍‍शी तक 8 माह का समय प्रकृति द्वारा कुछ न कुछ दिए जाते रहने का- अवदान का समय होता है। फिर आषाढ़ से कार्तिक तक चार महीने प्रकृति लगभग सोई रहती है।

अर्थात इन दिनों उसकी उर्वरा शक्ति मजबूत होती चलती है। इस अवधि में देव शक्तियां, प्रकृति की देने वाली सामर्थ्य या पोषण के अधिष्टाता देव सोये, अपनी शक्ति को फिर से अर्जित करन में लगे रहते हैं। इन चार महीनों में भगवान विष्णु क्षीरसागर की अनंत शैय्या पर शयन करते हैं, इसलिए कृषि के अलावा विवाह आदि शुभ कार्य इस समय तक बंद रहते हैं।

इसल‌िए सबसे पहले तुलसी व‌िवाह

tulsi vivaah dev pravodhani ekadashi

चार माह तक विश्राम करने के बाद, कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन विष्णु के स्वरुप शालिग्राम और तुलसी के मिलन का पर्व तुलसी विवाह (कार्तिक शुक्ल एकादशी) रचाया जाता है। तुलसी विवाह विशुद्ध मांगलिक और आध्यात्मिक प्रसंग है। तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। कहते है कि देवता जब जागते हैं, तो सबसे पहली प्रार्थना तुलसी की ही सुनते हैं। तुलसी विवाह का सीधा अर्थ है, तुलसी के माध्यम से भगवान का आह्वान। कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को तुलसी पूजन का उत्सव मनाया जाता है।

देवप्रबोधिनी एकादशी के दिन मनाए जानेवाले इस मांगलिक प्रसंग के सुअवसर पर सनातन धर्मावलम्बी घर की साफ-सफाई करते हैं और रंगोली सजाते हैं। शाम के समय तुलसी चौरा के पास गन्ने का भव्य मंडप बनाकर उसमें साक्षात् नारायण स्वरुप शालिग्राम की मूर्ति रखते हैं और फिर विधि-विधानपूर्वक उनके विवाह को संपन्न कराते हैं।

मंडप, वर पूजा, कन्यादान, हवन और फिर प्रीतिभोज, सब कुछ पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ निभाया जाता है। इस विवाह में शालिग्राम वर और तुलसी कन्या की भूमिका में होती है। इस व‌िवाह और पूजन का संबंध इन बातों से है क‌ि सभी कार्यों में तुलसी का पत्ता अनिवार्य माना गया है। प्रतिदिन तुलसी में जल देना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य माना है। तुलसी घर-आंगन के वातावरण को सुखमय तथा स्वास्थ्य वर्धक बनाती है। तुलसी के पौधे को पवित्र और पूजनीय माना गया है।

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