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लड़कियों को लड़कों से कम मानते हैं तो, जरा इन बातों पर गौर कीजिए
भानुमति नरसिम्हन/आर्ट आँफ लिविंग
Updated Sat, 24 Jan 2015 03:11 PM IST
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हर स्त्री के भीतर शक्ति एवं सुरम्यता, साहस एवं करुणा, नैतिक मूल्यों की सम्पन्नता एवं ज्ञान युक्त दूरदर्शिता का उपयुक्त सम्मिश्रण है। एक बड़े सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए जो बीज चाहिए वह उनके भीतर है। परन्तु, यह आवश्यक है की इस बीज का पोषण उचित शिक्षा, उपयुक्त आहार, और शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक स्वास्थय के माध्यम से किया जाए।
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भारतीय परंपरा में प्राचीन काल से पुरुषों और महिलाओं को जीवन के सभी पहलुओं में बराबर का दर्जा देकर सम्मानित किया गया है। इस सम्मान को ईश्वर के अर्धनारीश्वर रूप में आधा पुरुष व आधा महिला दिखा कर निरूपित किया गया है।
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यह इस बात का प्रतीक है कि दोनों सृष्टि के संरक्षण व पोषण में बराबर के भागीदार हैं। यहां तक कि हमारे शरीर में कोशिकाओं के स्तर पर भी प्रत्येक जीन में पिता व माँ दोनों की भागीदारी है। एक स्वस्थ प्रगतिशील समाज के लिए हमें महिलाओं का और उनकी भूमिका का सम्मान अवश्य करना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है की जिस देश में स्त्रियों को देवी माँ के रूप में पूजा जाता है वहाँ पर कन्या भ्रूण हत्या, महिलाओं के खिलाफ हिंसा और अशिक्षा की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
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दुनिया के सबसे खराब कन्या मृत्यु दर वाले देशों में आज भारत की गिनती है। इसका सबसे प्रत्यक्ष प्रभावित करने वाला कारक कन्याओं के स्वास्थ्य की उपेक्षा है। बीमार होने पर लड़कों की अपेक्षा लड़कियों को डॉक्टर के पास ले जाने के लिए अधिक लंबे समय तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।
यदि वह कन्या भ्रूण हत्या से बच भी जाए तो भी कई ऐसे आँकड़े उपलब्ध हैं जो दर्शाते हैं की लड़कों की तुलना में लड़कियों का टीकाकरण और पोषण का स्तर कम है। बच्चों का यौन शोषण एक भयावह सच है जिसका हम सामना कर रहे हैं।
50% से अधिक महिलाओं को शिक्षा नहीं मिलती जो एक और बड़ी चुनौती है। इन मुद्दों को केवल महिला अधिकार के मुद्दों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यदि महिलाएं अपने को सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं तो कहीं समाज का ताना बाना टूट चुका है। यह एक मानवाधिकार का मुद्दा है, जिसमें पुरुषों और महिलाओं को मिलकर इस अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए खड़ा होना चाहिये और इसका समाधान ढूँढना चाहिए।
एक माँ, बहन, दोस्त, पत्नी के रूप में-सभी भूमिकाओं में महिलाओं को सुनिश्चित करना है कि मानवीय मूल्यों का पतन न हो। महिलाओं को ऐसा करने के लिए सक्षम बनाने के लिए उन्हें उपयुक्त समय पर उचित मूल्य आधारित सर्वांगीण शिक्षा प्रदान करना आवश्यक है। उन्हें नकारात्मक भावनाओं और तनाव से निपटने के गुर सिखाने की जरूरत है।
लेखिका अंतर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन की अध्यक्ष हैं।