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जब स्वामी विवेकानंद के कहने पर विदेशी महिला ने उठाया बड़ा कदम
सत्यकाम शास्त्री
Updated Tue, 26 Jul 2016 11:17 AM IST
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विवेकानंद
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स्कॉटलैंड के नेशनल पार्क में स्वामी विवेकानंद का ओजस्वी भाषण हुआ। उन्होंने कहा कि संसार का नया निर्माण करने के लिए थोड़े से लोगों की जरूरत है। ज्यादा नहीं, सिर्फ बीस लोग मिल जाएं, तो भी काफी हैं। सच्चा आत्मसमर्पण करने वाले सिर्फ बीस लोकसेवक मिल जाएं, तो मैं दुनिया की तस्वीर ही बदल दूं।
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भाषण बहुत पसंद किया गया और उसकी सराहना भी की गई, पर सच्चे आत्मसमर्पण वाली मांग पूरी करने के लिए एक भी तैयार न हुआ। दूसरे दिन प्रातःकाल स्वामीजी सोकर उठे, तो उन्हें दरवाजे से सटी खड़ी एक महिला दिखाई दी। वह हाथ जोड़े खड़ी थी।
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स्वामीजी इतने सवेरे उस महिला को देखकर विस्मित हुए। उन्होंने परिचय जानने के बाद कहा, देवी इतनी सुबह क्या बात है? आप ठीक तो है न। महिला का नाम मिस नोबल था। उसने कहा, मैं पूरी तरह स्वस्थ और कुशल हूं। फिर स्वामीजी ने मिस नोबल से आने का कारण पूछा। वह पूछने लगे कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं। मिस नोबल कुछ कहे, इसके पहले उसका गला रुंध आया।
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आंखें भीग उठीं। रुंधे कंठ और भीगे नयनों से मिस नोबल ने स्वामी विवेकानंद से कहा, स्वामीजी! कल आपने दुनिया का नक्शा बदलने के लिए सच्चे मन से आत्मसमर्पण करने वाले बीस साथियों की मांग की थी। बाकी उन्नीस कहां से आएंगे, यह मैं नहीं जानती, पर एक मैं आपके सामने हूँ। इस समर्पित मन और मस्तिष्क का आप चाहे जो उपयोग करें।
स्वामी विवेकानंद गद्गद हो गए। इस भद्र महिला को लेकर वह भारत आए। उसने हिंदू साध्वी के रूप में नवनिर्माण के लिए जो अनुपम कार्य किया, उसे कौन नहीं जानता! वह महिला थी भगिनी निवेदिता। इसके बाद भगिनी निवेदिता स्वामीजी के साथ ही घूम-घूमकर काम करने लगीं। यहां संस्कार, चरित्र और राष्ट्रीय स्वाभिमान के लिए उन्होंने जो काम किया, उसका उल्लेख स्वामी विवेकांनद के बाद की अगली पंक्ति में किया जाता है।