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महाभारत के अंतिम दिन द्रौपदी ने लिया था यह बड़ा फैसला

Wed, 15 Jun 2016 12:17 PM IST
राकेश झा/अमर उजाला, नई दिल्ली
राकेश झा/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 15 Jun 2016 12:17 PM IST
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story of mahabharat draupadi
महाभारत द्रौपदी

महाभारत का युद्ध जिस दिन समाप्त हुआ, उस दिन श्रीकृष्ण पाण्डवों के साथ शिविर में नहीं लौटे, बल्कि उन्हें लेकर शिविर से दूर चले गए, जहां युद्धकाल में द्रौपदी तथा अन्य रानियां रहती थीं। उसी रात द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने पाण्डवों के शिविर में आग लगा दी और पाण्डव पक्ष के बचे हुए वीरों को सोते हुए ही मार डाला। द्रौपदी के पांचों पुत्रों भी इसी अग्निकांड में मार गए। अगली सुबह कृष्ण के साथ पाण्डव लौटे। शिविर की दशा देखकर उन्हें और परिवार को जो दुःख हुआ, वह वर्णनातीत है।

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द्रौपदी की व्यथा का तो पार नहीं था। उनके पांचों पुत्रों के शव सामने पड़े थे। ‘मैं हत्यारे अश्वत्‍थामा को इसका दंड दूंगा। उसका कटा मस्तक देखकर तुम अपना शोक दूर करना।’ इतना कहकर वह एक रथ में बैठकर निकल पड़े। अश्वत्थामा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करके भी बच नहीं सका। अर्जुन ने उसे पकड़ लिया, किंतु गुरुपुत्र का वध करना उन्हें उचित नहीं जान पड़ा। रस्सियों से भली प्रकार बांधकर रथ में डालकर वह उसे ले आए और द्रौपदी के सम्मुख खड़ा कर दिया। अश्वत्थामा को देखते ही भीमसेन ने दांत पीसकर कहा, 'इस दुष्ट को जीवित रहने का अधिकार नहीं है।’
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द्रौपदी की दशा ही भिन्न थी। पुत्रों की लाश सम्मुख पड़ी थी और उनका हत्यारा सामने खड़ा था; किंतु उन दयामयी को पुत्र-शोक भूल गया। पशु समान बंधे, लज्जा से मुख नीचा किए अश्वत्थामा को देखकर वह बोलीं, जिनकी कृपा से आपने अस्त्रज्ञान पाया है, वे गुरू द्रोणाचार्य ही यहां पुत्र के रूप में खड़े हैं; इन्हें छोड़ दीजिये। पुत्र-शोक कैसा होता है, यह अनुभव करती हूं। इनकी माता कृपा देवी को यह शोक न हो। द्रौपदी की दया विजयिनी हुई। अश्वत्थामा के मस्तक की मणि लेकर अर्जुन ने उसे छोड़ दिया।

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