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साधन और उपासना किसे कहते हैं और इसके क्या लाभ हैं?
श्रीराम शर्मा आचार्य / शांतिकुंज, हरिद्वार
Updated Wed, 04 Feb 2015 02:33 PM IST
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मनुष्य के दो भाग हैं-एक जड़ और दूसरा चेतन। जड़ पंचतत्त्वों से बना शरीर है और चेतन आत्मा। जड़ शरीर के लिए जड़ जगत से साधन उपक्रम प्राप्त होते हैं और उन्हें जुटाने के लिए भौतिक विज्ञान की विद्या अपनानी पड़ती है। ठीक इसी प्रकार आत्मा को चेतना की प्रगति और समृद्धि के लिए चेतना विज्ञान का सहारा लेना पड़ता है।
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अध्यात्म विज्ञान, ब्रह्मविद्या का प्रयोजन इसी आवश्यकता की पूर्ति करता है। अध्यात्म विज्ञान के लक्ष्य हैं-आत्मकल्याण, पूर्णता के परमात्मा स्तर तक पहुंचना। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए चार चरण निर्धारित हैं। 1. आत्मचिंतन, 2. आत्मसुधार, 3. आत्मनिर्माण, 4. आत्मविकास।
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1. आत्मचिन्तन यानी अपने चेतन, अजर अमर शुद्ध चेतन स्वरूप का मान। शरीर और मन में अपनी स्वतंत्र एवं पृथक सत्ता की प्रगाढ़ अनुभूति। 2. आत्मसुधार अर्थात अपने ऊपर चढ़े हुए मल आवरण विक्षेप, कषाय-कल्मषों का निरूपण-निरीक्षण और सुसंपन्न स्थिति को विपन्नता में बदल देने वाली विकृतियों की समुचित जानकारी।
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3. आत्मनिर्माण अर्थात् विकृतियों को निरस्त करके उनके स्थान पर सद्भावानाओं और सत्प्रवृत्तियों की, उत्कृष्ट कर्तव्य और आदर्श कर्तव्य स्थापित करने का सुनिश्चित संकल्प एवं साहसिक प्रयास।
4. आत्मविकास अर्थात् चिंतन और कर्तव्य को लोकमंगल के लिए सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए व परमात्मस्तर पर विकसित होने के लिए अधिकाधिक संयम, तप, त्याग-बलिदान को संतोष एवं आनंद की अनुभूति। इन चार चरणों में आत्मकल्याण का लक्ष्य प्राप्त होता है।
आत्मकल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जो कुछ करना पड़ता है, उसी का नाम उपासना एवं साधना है।