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इन बातों का ध्यान रखेंगे तो परिवार में आपसी प्यार बना रहेगा
श्री श्री रविशंकर/अध्यात्मिक गुरु
Updated Thu, 29 Jan 2015 12:33 PM IST
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सेवा करने के बारे में सोचो, यह हर व्यक्ति के लिए सही दिशा है अपनी आवश्यकताओं के बारे में चिंता मत करो। तुम्हारे अंदर उन आवश्यकताओं का ख्याल आने से भी पहले तुम्हारी आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाएगा।
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सबसे पहले यह सोचना चाहिए कि ‘मैं इस दुनिया के लिए क्या कर सकता हूँ?’ जो लोग केवल यह सोचते हैं कि, 'इस दुनिया से मैं क्या ले सकता हूँ' उदास हो जाते हैं। आप कहीं पहुंचना चाहते हैं लेकिन गलत दिशा में जा रहे हैं तो आप वहाँ तक पहुँच नहीं पायेंगे। एक परिवार का हर सदस्य यदि यह सोचता है कि 'हम दूसरे के लिए क्या कर सकते हैं?', तो वह परिवार आगे बढ़ता रहता है।
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जो परिवार ऐसा नहीं सोचता वह टूट जाता है। दूसरों से कोई अपेक्षा नहीं रखो। अपनी पूरी क्षमता लगाकर अन्य लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करो, तुम जितना भी अच्छा कर सकते हो उतना करो। समाज तुमसे उतना ही अपेक्षा करता है जितना तुम्हारा सामर्थ्य है।
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लेकिन जितना तुम्हारा सामर्थ्य है उतना नहीं करना गलत है। जो तुम नहीं कर सकते उसको करने की कोई आवश्यकता नहीं है। जो तुम कर ही नहीं सकते वह नहीं माँगा जाएगा। सेवा का अर्थ है अपनी सक्षमता के अनुसार करना। आप चाहे जितने भी अच्छे हों, लेकिन समाज आपको आपके सदगुणों से बेहतर मानेगा, और तुम चाहे जितने भी बुरे हो समाज आपको सबसे बुरे अवगुणों से बेहतर ही मानेगा। यह प्रकृति का नियम है।
सेवा पांच प्रकार के होते हैं :-
1 पहले प्रकार की सेवा वह है जब तुम यह जानते भी नहीं हो कि तुम सेवा कर रहे हो। तुम उसे सेवा नहीं मानते क्योंकि वह तुम्हारा स्वभाव है तुम उसे करे बिना रह नहीं सकते।
2 दूसरे प्रकार की सेवा तुम इसलिए करते हो क्योंकि वह उस परिस्थिति की ज़रूरत है।
3 तीसरे प्रकार की सेवा तुम इसलिए करते हो क्योंकि तुम्हें उससे आनन्द मिलता है।
4 चौथे प्रकार की सेवा इसलिए की जाती है क्योंकि तुम पुण्य कमाना चाहते हो। तुम भविष्य में किसी लाभ की अपेक्षा रखते हुए सेवा करते हो।
5 पांचवे प्रकार की सेवा तुम केवल दिखावे के लिए करते हो, तुम अपनी छवि को अच्छा बनाना चाहते हो और समाज और राजनीति में पहचान बनाना चाहते हो। इस प्रकार की सेवा से केवल थकान मिलती है, जबकि पहले प्रकार की
सेवा से बिलकुल थकान नहीं होती।
अपनी सेवा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए, तुम्हें सेवा के उच्चतर स्तरों की ओर बढ़ना चाहिए। इसकी परवाह मत करो कि शुरूआत में तुम किस श्रेणी में हो। सेवा करते समय यह नहीं सोचो कि तुम किसी पर एहसान कर रहे हो।