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बच्चों को योग्य बनाने के उपायः श्री श्री रविशंकर

Tue, 19 Mar 2013 08:00 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Tue, 19 Mar 2013 08:00 AM IST
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sri sri ravi shankar tips for child to make good person

इन दिनों माता-पिता के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि, वे अपने बच्चों के समक्ष एक स्वप्न रखकर बच्चों को उस पर चलने के लिए प्रेरित कैसे करें।

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आपको अपने बच्चों को बहुमुखी प्रवृत्तियों से परिचित कराना आवश्यक है- जैसे विज्ञान, कला और सबसे महत्वपूर्ण है सेवा। ये सुनिश्चित करें कि बच्चों की दृष्टि विशाल हो साथ ही उनकी जड़ें भी गहरी हों। प्रत्येक बालक इस धरती पर कुछ निश्चित प्रकृति और मूलभूत सोच के साथ आया है जो कि बदली नही जा सकती है।
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माता पिता के रुप में उनको स्वप्न के लिए प्रेरित करना आवश्यक है लेकिन झूठी आशा जगानी ठीक नही है। यह सुनिश्चित कर लें कि, आपके बालक की दायें और बायें मस्तिष्क की गतिविधियां ठीक है। ‘विद्या की देवी सरस्वती‘ की अवधारणा-विश्व मे अनूठी है। उनके एक हाथ में वीणा संगीत का यंत्र और दूसरे हाथ में पुस्तक ज्ञान का चिन्ह।
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पुस्तक बायें मस्तिष्क की प्रवृत्तियों को दर्शाता है और संगीत दायें मस्तिष्क की। जप माला भी है जो कि ध्यानमग्नता के पहलु पर प्रकाश डालती है। इस प्रकार गान, ज्ञान और ध्यान ये तीनों मिलकर सभी पहलुओं से शिक्षा को पूर्ण करते हैं।
बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं उनमें कई प्रकार की मनोग्रंथियों का विकास होने लगता है। एक अभिभावक के रुप में उनके विभिन्न आयु वर्ग के अनुसार व्यवहार का सूक्ष्म अध्ययन करके आपको महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है।

इस प्रकार उनके व्यवहार को देखकर आप समझ सकते है कि उनमें कोई हीन या अहं की भावना का विकास तो नही हो रहा या फिर वे पूर्ण अंतर्मुखी या ब्राह्यमुखी तो नही हो रहे। जो बच्चे हीनभावना से ग्रस्त होते हैं वे अपने से छोटों के साथ ज्यादा और अपने से बड़ों के साथ कम बातचीत करते हैं ।

जो बच्चे अहंभावी होते है वे छोटों को छोड़कर बड़ो के साथ ज्यादा रहते हैं। आपको कुछ इस प्रकार के खेल सृजित करने होंगे और उनके साथ इस प्रकार व्यवहार करना होगा ताकि वे तीनों आयु वर्ग के लोगों के साथ थोड़ी बहुत बातचीत करने लगें। आप उनका व्यक्तित्व केन्द्रित गुणवान सरल और सभी ग्रंथियों से मुक्त हो ऐसे ढाल सकते हैं।

जब एक बच्चा आपके पास आकर आपसे शिकायत करता है तो आप क्या करते हैं? क्या आप उनकी नकारात्मकता को बढ़ावा देते हैं या उसे सकारात्मकता में ढाल देते हैं? यहां पर आपको एक संतुलित भूमिका निभानी होती है। यदि वे किसी के बारे में आकर नकारात्मक बातें करते है तो आपको सकारात्मकता का दर्पण बनना होगा।

प्रकृति के अनुसार बालक में भरोसा रखने की प्रवृति होती है। लेकिन जब वे बड़े होते है तो उनका विश्वास कहीं ना कहीं टूट या हिल जाता है। एक स्वस्थ बालक में तीन प्रकार का विश्वास होता हैः- पहला दिव्यता में, दूसरा लोगों में और तीसरा लोगों की अच्छाई में। ये तीन प्रकार के विश्वास ही एक बालक को गुणवान और प्रतिभाशाली बनाने के लिए आवश्यक तत्व हैं।

यदि आप उनसे ये ही कहते रहेंगे कि यहां सभी झूठे या धोखेबाज़ है तो उनका लोगों और समाज से विश्वास उठ जाता है। और इसका असर हर रोज़ की उनकी बातचीत पर पड़ता है यदि उनका लोगों से, समाज से और लोगों की अच्छाई से विश्वास हट जाता है फिर वे चाहे कितने भी योग्य हों उनकी सारी योग्यता किसी के काम नही आती और वे कुछ भी करें असफल ही रहते है।

जब हम विश्वास का वातावरण बनाते हैं तो बच्चे बुद्घिमान बनकर बड़े होते हैं। लेकिन यदि हम नकारात्मकता, परेशानी, उदासी और क्रोध का वातावरण बनाते हैं तो वे बड़े होकर यही सब वापस लौटाते हैं।

हर रोज़ जब आप काम से लौटें तो उनके साथ खेलें या हंसे। जहां तक हो सके सभी एक साथ बैठकर खाना खाएं। एक रविवार उन्हें बाहर ले जाएं और उनको कुछ चॉकलेट देकर उन्हें सबसे गरीब बच्चों में बाँटने को कहें या फिर

साल में एक दो बार कच्ची बस्ती में ले जाकर उनसे कोई सेवा कार्य करने के लिए कहें।

थोड़ी बहुत धार्मिकता, नैतिक और अध्यात्मिक मूल्य उन पर गहरा प्रभाव उत्पन्न करते हैं। यह अज्ञात रुप से उनके व्यक्तित्व का विकास करते हैं। उनसे थोडा बहुत गाना, मंत्रोच्चारण, ध्यान और प्राणायम करवाना चाहिए। संशोधन से पता चला है कि ध्यान और प्राणायम उनकी योग्यता को बढ़ाते हैं। वे शांत, सतर्क, सजग और समझने की योग्यता को बेहतर कर पाते हैं।

पहले शिक्षक, गुरु और उपदेशक उनके सलाहकार की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। आजकल यह बच्चों के लिए उपलब्ध नही है। अभिभावक को दोनो ही भूमिका निभानी होती है, एक प्रेरक और दूसरी सलाहकार की। यह एक घुडसवारी की तरह ही है; कभी लगाम कसनी होती है तो कभी ढीली छोड़नी होती है।
स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग

श्री श्री रविशंकर परिचय

मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।

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