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जिनसे बहुत प्यार होता है उनसे ही क्यों सबसे ज्यादा नफरत हो जाती है?
श्री श्री रविशंकर/ अध्यात्मिक गुरु
Updated Mon, 19 Jan 2015 01:32 PM IST
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उपनिषद का अर्थ है समीप बैठना: मन को अहम से ब्रह्म के समीप ले जाना, परिमित को अनंत के समीप लाना, सीमित को असीम का बोध होना, ज्ञात को अज्ञात का बोध होना। यह हजारों साल पहले हुए गुरु और शिष्य के बीच के संवाद हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है कि शिष्य अपने ब्रह्मज्ञानी गुरु के पास बैठ कर कदम दर कदम ब्रह्मज्ञान के समीप पहुँचना सीखते थे।
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उपनिषद शान्ति मंत्र के साथ शुरू होता है। लोग एक दूसरे के समीप तभी आ सकते हैं जहाँ शान्ति हो। जहाँ संशय और अविश्वास होता है वहाँ एक दूसरे के बगल में बैठने के बावजूद लोगों के मन में अलगाव रहता है। अब हमारी समझ, सोच, और भावनाओं में अलगाव हो तब कोई संभाषण या विनिमय नहीं हो सकता है। तो पहली आवश्यकता शांति है। शांति के तीन प्रकार होते हैं; एक भौतिक शांति है– जब वातावरण शांतिपूर्ण हो। दूसरा जब विचारों और भावनाओं के स्तर पर शांति रहे। और तीसरा अन्तर्मन की शांति है।
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इसलिए हर उपनिषद की शुरुआत शान्ति प्रार्थना के साथ होती है–
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
“परमात्मा हमें दोनों की रक्षा करे, हम एक साथ अपनी क्षमता का विकास करें। हम तेजस्वी और दीप्तिमान बनें। हम एक दूसरे से द्वेष नहीं करें।“वास्तव में हमारी प्रगति को रोकने वाला हमारा द्वेष भाव है। भगवान बुद्ध के बारे में एक कहानी है कि वह किसी भी नए शिष्य से सबसे पहले कहते थे कि वे किसी से भी द्वेष नहीं करें और दया करके सबको क्षमा कर दें।
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एक सज्जन बुद्ध के संघ में शामिल होने के लिए आये और कहा कि आप जो भी कहो वह देने को तैयार हूँ, मैं दुनिया के लिए अपना पूरा जीवन दे सकता हूँ, लेकिन मैं बस दो लोगों से प्यार नहीं कर सकता हूँ; मैं उन्हें नफरत करता हूँ। बुद्ध सरलतापूर्वक मुस्कुराये और कहा,“मैं नहीं चाहता कि तुम पूरी दुनिया को प्यार करो, लेकिन क्या तुम केवल इन दो लोगों के लिए दया रख सकते हो?"
आप जिस किसी से भी घृणा करते हो वह आपके मन में एक बहुत बड़ा अवरोध बन जाता है। प्रायः आप उन व्यक्तियों से घृणा करने लगते हैं जिनसे आप बहुत प्यार करते हैं। आपको व्यक्ति से प्यार होता है और प्यार समाप्त हो जाता है क्योंकि आपका प्यार केवल उनसे कुछ पाने में लगा हुआ रहता है।
और जैसे ही वह मिलना बंद हो जाता है वैसी ही आप उनसे द्वेष करने लगते हो। इसी कारण से कुछ लोग उन्हीं को मारते हैं जिनसे वे प्यार करते हैं क्योंकि उनकी पीड़ा और घृणा का दर्द उनके प्रेम से ज्यादा है। यानि जब तक द्वेष भावना आपके सामने एक बाधा के रूप में खड़ी है तब तक आप परमात्मा के समीप नहीं जा सकते।
गुरु क्यों कहते हैं कि हम किसी से भी घृणा नहीं करें? क्योंकि शिष्य को यह समझ में नहीं आ पाता कि एक ऐसी अवस्था भी हो सकती है जिसमें द्वेष का कोई अस्तित्व ही नहीं है। जो हर समय एक रेगिस्तान में रहा है, उसके लिये उत्तरी ध्रुव के इग्लू की कल्पना करना मुश्किल है।
द्वेष हमसे ही शुरू होती है। हम स्वयं को प्यार नहीं करते, और फिर किसी तरह हम अपने से नफरत शुरू कर देते हैं और फिर हम सबसे नफरत शुरू कर देते हैं। इसलिए उपनिषद कहते हैं कि द्वेष को छोड़ दो क्योंकि द्वेष हमें खराब कर रही है और मार रही है। किसी के आने से आप में घृणा की ज्वाला जलने लगती है, पर वे व्यक्ति तो खुश हैं और आनंद उठा रहे हैं, लेकिन आप ही अन्दर ही अन्दर कुढ़ रहे हैं।
अपने अन्दर द्वेष को पालना, पोषित करना, और न्यायोचित ठहराना निरा मूर्खता है। मन में जब घृणा होती है तब आप चीजों का वास्तविक रूप नहीं देख पाते। आप अपने रवैये को, गुस्से को और अपनी भावनाओं को सही ठहराते हैं। बाह्य शांति हो सकती है और आप बहुत चुपचाप दिख सकते हैं लेकिन यदि आपका मन घृणा से उबल रहा है तब सच्ची शांति नहीं हो सकती है।
जब तक आप के पास चलने के लिए एक आध्यात्मिक पथ नहीं रहता तब तक आत्मा बेचैन रहती है। अपने अन्दर आत्मविश्वास रखिये जो कहे,"मैं ठीक ट्रेन में हूं, और यह ट्रेन मुझे अपने गंतव्य तक ले जायेगी।" ट्रेन में चढ़ने के बाद अपने सामान को सर पर ढोकर एक कोच से दूसरे कोच के बीच भागदौड़ करने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसा करने से आप और जल्दी नहीं पहुँच सकते हैं। इस प्रकार की भीतरी बेचैनी आपको मार देती है। तभी गुरु कहते हैं, "ॐ शांति शांति शांति"।
17-19 जनवरी को पूज्य श्री श्री रवि शंकर जी द्वारा ईशावास्य उपनिषद का व्याख्यान, अधिक विवरण के लिये देखें www.artofliving.org/upanishad