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तब विकास होता है और समृद्घि प्राप्त होती है

Tue, 08 Apr 2014 12:45 PM IST
श्री श्री रविशंकर/अध्यात्मिक गुरु
श्री श्री रविशंकर/अध्यात्मिक गुरु Updated Tue, 08 Apr 2014 12:45 PM IST
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sri sri ravi shankar pravachan on natural behaviour

जीवन में आप जो कुछ भी करते हैं उसके लिए कोई ना कोई वजह या कोई ना कोई कारण होता है और वह कारण या वजह ही इच्छा है। इच्छा किस प्रकार की होनी चाहिए? इच्छा धर्म के विरोध में ना होकर उसके अनुरूप होनी चाहिए, भगवान श्रीकृष्ण कहते है मैं धर्म के विरोध में ना जाने वाली वह इच्छा हूं। जो लोग धर्म के अनुरूप कार्य करते हैं और अपने स्वधर्म का पालन करते हैं फिर जो इच्छा उन लोगों में उत्पन्न होती है वह सिर्फ मैं ही हूं।

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धर्म वह है जो मन, बुद्धि, स्मृति और स्वयं को सामंजस्य के साथ बांधकर रखता है मन की अस्पष्टता और तनाव के कारण अधर्म का आतिस्त्व है। जब मन केन्द्रित नहीं होता और दिल टूटा हुआ हो तब अधर्म आस्तित्व में आता है और ज्ञान और विवेक आपको धर्म के मार्ग पर केन्द्रित रखते हैं और जब हम स्वधर्म का पालन करते हैं तब विकास होता है।
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अपने विवेक ,कौशल, प्रतिभा और अपने स्वाभाव के अनुरूप काम करना स्वधर्म है जिसके लिए आप स्वयं जिम्मेदार होते हैं। ऐसा कोई भी काम जो आपको चिंता और बैचेनी न दे स्वधर्म है।
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जब हम कोई भी काम किसी को दिखाने के लिए बिना किसी प्रमाणिकता के साथ करते हैं तो हमें भय उत्पन्न होता है क्योंकि वह काम वास्तव में सही नहीं है, और वह दिल से नहीं निकला है। जब हम कोई सही कार्य दिल से करते हैं तो उसमें कोई भय उत्पन्न नहीं होता।

जब कोई झूठ बोलता है तो वह निश्चित ही भीतर से भयभीत रहता है और जब कोई व्यक्ति सत्य कहता है तो उसे कोई भी भय नहीं रहता यही स्वधर्म है। जो कुछ हमें स्वाभाविक रूप से मिला है और जब हम उसका पालन करते है तो हमें जीवन में प्रचुरता और समृद्धि प्राप्त होती है।


जब हम अपने स्वाभाव के अनुरूप प्रवाहित होते हैं तो हमारा विकास होता है। जब हम धर्म के अनुरूप कार्य करते हैं तो हम से कुछ गलत नहीं होता। आप सब ने इसका अनुभव किया होगा जब आप दिल से उठी इच्छा के अनुरूप कार्य करते होंगे। इससे आपकी स्वयं की और दूसरों की चेतना में उन्नति होती है। इससे सबको लाभ मिलता है। ऐसी इच्छाएं भगवान का स्वरुप होती हैं।
साभारः आर्ट ऑफ लिविंग

श्री श्री रविशंकर परिचय

मानवीय मूल्यवादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।

महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।

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