फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Spirituality ›   Wellness ›   sri sri ravi shankar pravachan money gives lie independency

झूठी स्वतंत्रता का अहसास कराता है धनः श्री श्री रविशंकर

Tue, 23 Apr 2013 12:03 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Tue, 23 Apr 2013 12:03 PM IST
विज्ञापन
sri sri ravi shankar pravachan money gives lie independency

धन स्वामित्व और स्वतंत्रता का भाव देता है। किसी चीज़ का स्वामित्व का अर्थ है कि उसके अस्तित्व पर सम्पूर्ण नियंत्रण। जब आप कोई जमीन का टुकड़ा खरीदते हैं तो आप सोचते हैं कि आप उसके मालिक हैं जबकि उस जमीन का अस्तित्व उसके मालिक के मृत्यु के उपरांत भी रहता है। आप किसी चीज के मालिक कैसे हो सकते हैं जो आपके मृत्यु के उपरांत की रहेगी?

विज्ञापन


धन यह भी कल्पना देता है कि आप शक्तिशाली और स्वतंत्र हैं और इस तथ्य को सोचने में अंधे हो जाते हैं कि आप पारस्परिक निर्भरता की दुनिया में रहते हैं। आप सोचते हैं कि आप धन से किसी के भी मालिक बन सकते हैं, और किसी की सेवा के लिए उसका मूल्य लगा सकते हैं। हम कृषक, चालक, रसोइये और हमारे आसपास के कई लोगों की सेवा पर निर्भर हैं। एक विशेषज्ञ सर्जन भी किसी की सहायता के बिना स्वयं शल्य क्रिया (आपरेशन) नहीं कर सकता।
विज्ञापन


वह भी दूसरे पर निर्भर है। सिर्फ कुछ रूपये देकर आप इस सच्चाई पर ध्यान नहीं देते कि आप उन पर निर्भर हैं। कृतज्ञ होने के बजाय आप सोचते हैं कि आपने उन पर उपकार किया है। अगर आप धनी लोगों के घमंडी होने का कारण देखें तो आप पायेंगे कि यह धन द्वारा पाई गई स्वतंत्रता का भाव है। दूसरी तरफ निर्भरता की सजगता व्यक्ति को नम्र बना देती है।
विज्ञापन
विज्ञापन


स्वतंत्रता का ये झूठा भाव मनुष्य से उसकी विनम्रता का मूल गुण छीन लेता है। मानवीय मूल्य इय स्तर पर नष्ट हो गये हैं कि हम लोगों की योग्यता उनकी वित्तीय सामर्थ्य के साथ आंकते हैं। क्या धन से सचमुच किसी व्यक्ति का मूल्य दर्शाया जा सकता है? अक्सर आप लोगों को लखपति या करोड़पति कहते हैं। इस तरह से किसी व्यक्ति को नाम देना, उसकी प्रशंसा नहीं है।

आप मानवीय जीवन का कोई मूल्य नहीं लगा सकते। संपत्ति को कौशल, योग्यता, विरासत से या भ्रष्ट तरीकों से प्राप्त किया जा सकता है। संपत्ति कमाने के साधन के अनुसार उसके परिणाम मिलते हैं। भ्रष्टाचार का लक्ष्य शांति और सुख है। फिर भी अगर तरीका भ्रष्ट हो तो शांति और सुख भ्रामक हो जाते हैं।

एक तरफ कुछ लोग धन को समाज की बुराईयों का कारण मानते हैं। कुछ लोग इसे ही बुराई मानते हैं। जिस तरह धन का होना घमंड का कारण बन सकता है वैसे ही धन का तिरस्कार करना भी घमंड पैदा करता है। कई लोग जो धन को त्याग देते हैं वे दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए और सहानुभूति पाने के लिये अपनी निर्धनता पर गर्व करते हैं। परन्तु प्राचीन साधुओं ने धन की कभी निंदा नहीं की।

उन्होंने उसे ईश्वर का अंश मानकर उसका सम्मान किया और उसके भ्रम के मायाजाल की पकड़ से परे हो गये। वे जानते थे कि यदि हम किसी बात का तिरस्कार करते हैं या उससे घृणा करते हैं, तो उससे कभी भी परे नहीं हो सकते। उन्होंने धन का सम्मान भगवान नारायण की पत्नी देवी लक्ष्मी के रूप में किया।

अज्ञान की स्थिति में लोग यह भूल जाते हैं कि इस ब्रम्हाण्ड में सबसे विश्वसनीय चीज/वस्तु हमारा भीतर का स्वयं है और वे धन को सुरक्षा का स्रोत मानकर उस पर विश्वास करना प्रारंभ कर देते हैं। जब लोगों मे अपनी योग्यता, समाज की अच्छाई या ईश्वर के प्रति श्रद्धा कम हो जाती है तो वे असुरक्षा के गहरे भाव से पीड़ित हो जाते हैं। यह आज की प्रमुख समस्या है।

इसकी वजह से केवल धन की प्राप्ति ही सुरक्षा प्रदान करने का जरिया प्रतीत होती है। वे उस पर विश्वास करते हैं जो निश्चित नहीं है और अंत में वे निराश हो जाते हैं। अनिश्चिता के कारण स्थिरता की तृष्णा उत्पन्न होती है। संसार परिवर्तनशील है और आत्मा परिवर्तित नहीं होती है। हमें जो बदलता नहीं उस पर विश्वास करना होगा और परिवर्तन को स्वीकार करना होगा।

यह वैसे है जैसे कि वास्तविक को अवास्तविक और अवास्तविक को वास्तविक समझना। वास्तव में सारे दुःख अवास्तविक होते हैं। एक ज्ञानी व्यक्ति जानता है कि प्रसन्नता वास्तविक है क्योकि वह आपका मूल स्वभाव है। अप्रसन्नता अवास्तविक होती है क्योंकि वह आपकी स्मरण शक्ति की देन होती है।

जब आप सब कुछ को एक सपने कि तरह देखने लगते हैं तो आप अपने प्राकृतिक स्वभाव में रहने लगते हैं जो प्रेम, आनंद और शांति है। फिर हम यह समझ जाते हैं कि धन इतना महत्वपूर्ण नहीं है। मानवीय मूल्य, अपनापन, प्रेम और सेवा अधिक महत्वपूर्ण है।


स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग

श्री श्री रविशंकर परिचय

मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।


विज्ञापन
विज्ञापन
सबसे विश्वसनीय हिंदी न्यूज़ वेबसाइट अमर उजाला पर पढ़ें आस्था समाचार से जुड़ी ब्रेकिंग अपडेट। आस्था जगत की अन्य खबरें जैसे पॉज़िटिव लाइफ़ फैक्ट्स, परामनोविज्ञान समाचार, स्वास्थ्य संबंधी योग समाचार, सभी धर्म और त्योहार आदि से संबंधित ब्रेकिंग न्यूज़।
 
रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें अमर उजाला हिंदी न्यूज़ APP अपने मोबाइल पर।
Amar Ujala Android Hindi News APP Amar Ujala iOS Hindi News APP
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed