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आत्मा की चेतना को जगाने वाला ध्यान
अध्यात्मिक गुरू/ अाचार्य महाप्रज्ञ
Updated Sat, 30 Nov 2013 02:40 PM IST
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उलझनों या आवेशों पर नियंत्रण जब तक नहीं होता, तब तक शक्ति का विकास कठिन है। इसलिए आज सबसे बड़ी मांग है कि प्रत्येक व्यक्ति ध्यान में प्रवेश करें। शक्ति के लिए जरूरी है कि शरीर और मन साथ में जुड़े रहें। शरीर एक काम करता है, तो मन दूसरा काम करता है जिससे शक्तियां क्षीण होती हैं।
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शक्ति का सबसे बड़ा रहस्य है शरीर और मन दोनों का एक साथ रहना। शरीर की शक्ति का होना एक बात है और मन की शक्ति का होना दूसरी बात है। ऐसे लोग होते हैं जो हजारों व्यक्तियों का सामना कर लेते हैं। पर उनका मन इतना निर्बल हो जाता है कि वे पग-पग पर घुटने टेक देते है।
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जीवन की इस लड़ाई में वही सफल हो सकता है जो ध्यान और एकाग्रता का अभ्यास करता है। मन में अनगिनत विकल्प उठते हैं। उनसे मन की शक्ति क्षीण होती है। जब मन विकल्प शून्य होता है, तब मन की शक्ति क्षीण होने से बच जाती है।
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एक निशानेबाज अपने निशाने को एकाग्रता से साध लेता है, पर अपनी इच्छाओं पर प्रहार नहीं कर सकता। वह विफल हो जाता है। कोरी एकाग्रता ही पर्याप्त नहीं है, मन की निर्मलता भी चाहिए। मन की निर्मलता से शक्ति बढ़ती है। इससे मन टूटता नहीं और वह होने वाली हर घटना और परिस्थिति को सह लेता है। परिस्थिति को सहना छोटी बात नहीं है, बहुत बड़ी बात है।
दो बातें हैं-ज्ञान और संवेदना। ज्ञान से शक्ति का विकास होता है और संवेदना के द्वारा शक्ति का हास होता है, शक्ति क्षीण होती है। सुख दुख ज्ञान से जुड़ा हुआ नहीं है, वह संवेदना से जुड़ा है। जिस व्यक्ति का संवेदन जितना तीव्र होता है, उतना ही वह सुखी और दुखी बनता है।
इन्द्रियों ओर मन के संवदेना से आदमी सुखी और दुखी बनता है। यह एक बहुत बड़ी साधना है कि आदमी इन संवदेनों से उपर उठकर ज्ञानी बन जाए। ज्ञानी सुख दुख की घटना को जानता है किन्तु भोगता नहीं। अज्ञानी सुख दुख की घटना को जानता कम है, भोगता अधिक है।
संवदेनशील हर बात से सुख दुख का अनुभव करता है। कभी सुखी बनता है, कभी दुखी। कभी नाराज होता है, कभी राजी। कभी हीनता से ग्रस्त होता है और कभी अहंकार से फूल जाता है। दोनों ओर से वह दुख भोगता जाता है। जब आदमी दुख भोगता रहता है तब उसकी शक्तियां बहुत क्षीण हो जाती है।
मन बार-बार टूटता रहता है। यह एक ऐसा शीशा है कि वह थोडी सी ठेस को सहन नहीं कर सकता, तत्काल टूट जाता है। जब तक हम इस मन को फौलादी न बना दें मजबूत न बना दें, तब तक इसके टूटने की स्थिति समाप्त नहीं हो सकती।
ध्यान आध्यात्मिक होता है, आत्मा की चेतना को जगाने वाला है, आत्मा की शक्ति का संवर्धन करने वाला है। यह मनुष्य के मोह और मूर्च्छा को तोड़ने वाला होता हैं। आध्यात्मिक होने के साथ-साथ वह वर्तमान जीवन में तथा व्यवहार के क्षेत्र में बहुत लाभप्रद होता हैं। उससे मन शक्तिशाली बनता है, भावनाएं शुद्ध होती हैं, आवेश कम होता है, निराशा, कलह और चिंता कम होती है। व्यक्ति आनन्द और सौम्य जीवन की इच्छा से भर उठता है।