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सीता परम सत्य योगमाया
लावण्या दीपक शाह
Updated Sat, 18 May 2013 01:07 PM IST
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सीता उपनिषद में देवगणों और प्रजापति के बीच हुए प्रश्नोत्तर में 'सीता' को शाश्वत शक्ति का आधार माना गया है। संवाद में सीता को प्रकृति का स्वरूप बताया गया है। सीता शब्द का अर्थ अक्षरब्रह्म की शक्ति के रूप में हुआ है। यह नाम साक्षात् 'योगमाया' का है।
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सीता को भगवान श्रीराम का सान्निध्य प्राप्त है, जिसके कारण वे विश्व कल्याणकारी हैं। सीता-क्रिया-शक्ति, इच्छा-शक्ति और ज्ञान-शक्ति-तीनों रूपों में प्रकट होती है। परमात्मा की क्रिया-शक्ति-रूपा सीता परब्रह्म परमात्मा के मुख से 'नाद' रूप में प्रकट हुई है। वह प्रणव यानी ओंकार की वाचक हैं। उनका नाम ही प्रणव नाद, ओंकार स्वरूप है। परा प्रकृति एवं महामाया भी वही हैं।
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उपनिषद के अनुसार सीता शब्द का पहला अक्षर "सी" परम सत्य से प्रवाहित हुआ है और "ता" वाक की अधिष्ठात्री वाग्देवी स्वयं हैं। उन्हीं से समस्त वेद प्रवाहित हुए हैं। सीता पति राम से समस्त ब्रह्मांड, संसार तथा सृष्टि उत्पन्न हुए हैं जिन्हें ईश्वर की शक्ति ‘सीता' धारण करतीं हैं।
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सीता जी भूमिरूप है। भूमि से उत्पन हुई है, इसलिए भूमात्मजा भी कही जाती हैं। सूर्य, अग्नि एवं चंद्रमा का प्रकाश सीता जी का ‘नील स्वरूप‘ है। चंद्रमा की किरणें विविध औषधियों को रोग प्रतिकारक गुण प्रदान करतीं हैं। ये चन्द्र किरणें अमृतदायिनी सीता का प्राणदायी और आरोग्य वर्धक प्रसाद है वे ही हर औषधि की प्राण तत्त्व हैं।
उपनिषद के अनुसार सूर्य की प्रचंड शक्ति द्वारा सीता ही काल का निर्माण एवं ह्रास करतीं हैं। सूर्य द्वारा निर्धारित समय भी वही हैं, अत: वे काल धात्री भी हैं। पद्मनाभ, महाविष्णु, क्षीर सागर के स्वामी श्रीमन्न नारायण के वक्ष स्थल पर श्रीवत्स के रूप में सीता ही विद्यमान हैं।
कामधेनु और स्यमंतक मणि भी वही जानकी हैं। वेद पाठी, अग्निहोत्री, द्विजवर्ग कर्मकांडों के जितने भी स्वरूप हैं संस्कार, विधि पूजन या हवन आदि संपन्न कराते हैं, उनकी शक्ति भी सीता हैं। उपनिषद में सीता के वैभव का जैसा वर्णन किया गया है, उसके अनुसार स्वर्ग की अप्सराएं जया ,उर्वशी, रम्भा मेनका आदि इनके आगे नृत्य करतीं हैं। नारद उनके आगे वीणा वादन करते और ऋषिगण विविध वाद्य बजाते हैं।
चन्द्र देव छत्र धरते हैं। रत्न रजित दिव्य सिंहासन पर सीता देवी आसीन हैं। उनके नेत्रों से करुणा और वात्सल्य भाव प्रवाहमान है। वे कालातीत एवं और काल के परे हैं। इस सीता उपनिषद का संदेश यह है कि भगवती जानकी आदिशक्ति हैं।
उनकी करुणा और अनुग्रह से संसार चल रहा है। राम कथा के स्थूल रूप में सीता नामक जिन देवी का उल्लेख आता है, उसमें इस आदिशक्ति के रहस्यों का विवेचन किया गया है। उसके अनुसार राम परात्पर ब्रह्म हैं तो भगवती सीता उनकी आह्लादिनी शक्ति। सीता की उपस्थिति के अस्तित्व को प्राणवान बनाती हैं। उपासक को उस शक्ति का अनुग्रह मिलता है।