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नौकरी करते हुए परमात्मा से एकाकार हुआ जा सकता है
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Mon, 30 Sep 2013 01:55 PM IST
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शिव की नगरी काशी संतो की आश्रय स्थली रही है। इसी काशी की भूमि पर कृष्ण के गीता में बताए गए- क्रियायोग- को जिज्ञासुओं और साधकों के लिए सुलभ कराने का कार्य संत श्यामा चरण लाहड़ी ने किया। इनका जन्मदिवस हर साल 30 सितंबर को मनाया जाता है।
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संत लाहड़ी महाशय की गिनती आध्यात्म जगत में उन संतों में होती है जिन्होने खुद तो आत्मसाक्षातकार कर आत्मा और परमात्मा के एक होने के सत्य को जाना ही आमजन के लिए भी उसका मार्ग खोल दिया। इनके पिता गौर मोहन लाहड़ी और माता मुक्तकेशी देवी थीं। लाहड़ी परिवार के गृहदेवता शिव थे।
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एक दिन मुक्तकेशी शिशु श्यामाचरण को गोद में लिए शिव मंदिर में ध्यान में बैठी थीं तभी एक जटा-जूट धारी साधु ने आकर उनसे कहा कि तुम्हारा बेटा कोई साधारण मानव शिशु नहीं है। उसे मैंने ही अपने योगबल से तुम्हारे पुत्र के रूप में भेजा है। मैं परछाईं की तरह हमेशा इसके साथ रहूंगा। यह गृहस्थ जीवन जीते हुए लोगों को योग साधना की और आकर्षित करेगा।
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बाद में गौरमोहन काशी आकर रहने लगे। श्यामाचरण की शिक्षा यहीं हुई। वह बचपन से ही शिव भक्त थे। घंटो साधना में बैठे रहते। 23 साल की उम्र में इन्होंने सेना की इंजीनियरिंग शाखा के पब्लिक वर्क्स विभाग में गाजीपुर में क्लर्क की नौकरी कर ली। 23 नबंबर 1868 को इनका तबादला हेड क्लर्क के पद पर रानीखेत के लिए हो गया। काफी दिनों बाद तांगे और विभिन्न साधनों से वह रानीखेत पहुंचे। उस समय यहां चारों ओर घना जंगल था।
यहां सैनिकों के लिए रसद पहुंचाने का रास्ता तैयार होना था। एक दिन श्यामाचरण निर्जन पहाडी रास्ते से गुजर रहे थे तभी अचानक किसी ने उनका नाम लेकर पुकारा। श्यामाचरण ने देखा एक संयासी पहाड़ी पर खडे थे। वह नीचे की ओर आए और कहा-डरो नहीं मैंने ही तुम्हारे अधिकारी के मन में गुप्तरुप से तुम्हे रानीखेत तबादले का विचार डाला था।
उसी रात श्यामाचरण को द्रोणागिरी की पहाडी पर स्थित एक गुफा में बुलाकर दीक्षा दी। दीक्षा देने वाले कोई और नहीं कई जन्मों से श्यामाचरण के गुरू महाअवतार बाबाजी थे। श्यामाचरण लाहड़ी ने 1864 में काशी के गरुड़ेश्वर में मकान खरीद लिया फिर यही स्थान क्रिया योगियों की तीर्थस्थली बन गई।
क्रियायोग एक सरल मन कायिक प्रणाली है जिसके जरिए मानव रक्त कार्बन रहित होकर आक्सीजन से पूरित हो जाता है। इस अतिरिक्त आक्सीजन के अणु प्राणघारा में रुपान्तरित हो जाते हैं,जो मस्तिष्क और मेरू दंडों में नवशक्ति का संचार कर देती है। शिराओं में बहने वाले अशुद्ध रक्त के रुक जाने से योगी उत्तकों में होने वाले ह्रास को कम कर सकते हैं या रोक सकते हैं।
यह एक विशिष्ठ विधि है जो परमतत्व के साथ मिलन का एक मार्ग है। उस काल में काशीनरेश, नेपाल नरेश सहित तमाम प्रतिष्ठित लोगों ने अपने बच्चों को भी शिक्षा के लिए लाहडी महाशय के पास भेजा। काशी के एक संत तैलंग स्वामी जो तीन सौ साल से अधिक समय तक शरीर धारण किए हुए थे वह लाहड़ी महाशय को ऐसा गृहस्थ संत कहते थे जिसने परमात्मा के साथ साक्षात्कार कर लिया हो।
लाहड़ी महाशय ने यह प्रमाणित किया की गृहस्थ जीवन में अपनी जीवकोपार्जन के लिए नौकरी करते हुए भी क्रियायोग से आत्म साक्षातकार कर परमात्मा के साथ एकाकार हुआ जा सकता है।