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इस 'एक कारण' से टूटते हैं रिश्ते और दिल
राकेश/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 06 Jul 2013 09:04 AM IST
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हम सभी दिल से यही चाहते हैं कि हमारे सभी रिश्ते मजबूत रहें और रिश्तों में प्रेम की गंगा बहती रहे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता। कुछ लोगों से रिश्ते अच्छे से निभते हैं लेकिन कुछ लोगों से रिश्तों को निभाना कठिन जान पड़ता है और अंततः आपसी कड़वाहट के कारण रिश्ते टूट भी जाते हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि रिश्ते उन्हीं से ज्यादा कड़वे हो जाते हैं जिनसे हमारा सबसे ज्यादा लगाव रहता है।
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ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम रिश्तों को अपनी जागीर समझ लेते हैं और उससे जरूरत से अधिक अपेक्षा करने लगते हैं। आमतौर पर वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी के बीच नोंक झोंक और रिश्ते टूटने के मामले अधिक होते हैं। इसका कारण यह नहीं है कि रिश्ते में प्यार नहीं होता है। कुछ मामलों को छोड़ दें तो असल में वहीं अधिक नोंक झोंक और रिश्ते टूटने की घटनाएं होती हैं जहां प्यार अधिक होता है। इसका कारण मात्र इतना है कि पति पत्नी एक दूसरे से जरूरत से अधिक अपेक्षा रखने लगते हैं।
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भाई-भाई में विवाद का कारण भी अपेक्षा है। लोगों को यह लगता है कि उनके भाई उनसे अधिक सुखी हैं, उनके पास अधिक धन है। भले ही आपके पास भी खूब धन हो लेकिन आपकी अपेक्षा रहती है कि आपका भाई आपको अपने धन में से कुछ देता। परिवार के प्रति अपना कर्तव्य खुद भले नहीं निभाएं लेकिन भाई से अपेक्षा रखेंगे कि वह परिवार की जिम्मेदारियों को उठाए। इन्हीं बातों को लेकर मन मुटाव बढ़ता है।
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रिश्तों में दूरियां बढ़ने की घटनाएं माता-पिता और बच्चों के बीच भी होती हैं। माता पिता अपने बच्चों को बड़े जतन से पालते हैं। उन्हें उम्मीद रहती है कि बच्चे बड़े होकर बुढ़ापे में उनकी सेवा करेंगे। लेकिन जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और अपने निजी जीवन में मस्त हो जाते हैं तो माता-पिता को तकलीफ होने लगती है क्योंकि उनकी अपेक्षा को ठेस लगती है।
कई बार बच्चों को यह लगता है कि माता-पिता उन्हें ही हर बात में डांटते हैं या कोई काम करने के लिए कहते हैं। अन्य बच्चों को न डांटते हैं और न कुछ कहते हैं। इससे मन में तकलीफ होने लगती है। जबकि सच यह है कि माता-पिता उन्हें ही कुछ कहते हैं जिन्हें उनकी अधिक अपेक्षा रहती है। अगर व्यक्ति किसी से कोई अपेक्षा न रखे और सिर्फ अपने कर्तव्य का पालन करे तो संसार में किसी से बैर नहीं हो सकता है।
शास्त्रों में कहा गया है कि जब किसी व्यक्ति की मृत्यु आती है तब उसका अपने शरीर से मोह बढ़ जाता है। व्यक्ति अपने शरीर को और अधिक समय तक भोगने की अपेक्षा रखने लगता है और जब अपेक्षा चरम पर पहुंच जाती है तब आत्मा शरीर को छोड़कर चली जाती है। गीता में कहा गया है कि संसार में मोह ही दुःख का कारण है। अपेक्षा मोह का ही रूप है, इससे जितना नाता तोड़ेगे उससे उतना ही नाता मजबूत होगा।