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भगवान राम का हनुमान और अन्य वानरों से दोस्ती का रहस्य

Mon, 29 Sep 2014 03:20 PM IST
Updated Mon, 29 Sep 2014 03:20 PM IST
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ramleela hanuman and ram sugriv friendship

रामलीला में सीता हरण के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग आता है राम का हनुमान से मिलना और सुग्रीव के साथ इनकी मित्रता। सुग्रीव से मित्रता के बाद ही भगवान राम को वानरों का सहयोग मिला और भगवान राम सीता की तलाश करने में सफल हुए। लेकिन अभी तो हम उस दृश्य की ओर आते हैं जब भगवान राम और लक्ष्मण स्वर्ण मृग बने मारीच का वध करके अपनी कुटिया में आते हैं।

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कुटिया विरान है और भगवान राम देवी सीता को आवाज दे रहे हैं। जब सीता की आवाज नहीं आती है और कुटिया में सीता नहीं दिखती है तब भगवान राम और लक्ष्मण के मन में यह शंका उठती है कि देवी सीता आखिर कहां गई। राक्षसों की माया जानकर भगवान राम और लक्ष्मण सीता को तलाश करते हुए चित्रकूट से चलकर मलय पर्वत की ओर आ पहुंचे।
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मलय पर्वत को उत्तर भारत और दक्षिण भारत की सीमा माना जाता है। पर्वत को पार करने के बाद राम और लक्ष्मण जब आगे बढ़े तब सुग्रीव के गुप्तचरों ने धनुष वाण लिए दो वीरों को देखा तो भयभीत हो गए उन्हें लगा कि सुग्रीव को मारने के लिए वानरों के राजा बाली ने इन्हें भेजा है।
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जब पहली बार मिले राम और हनुमान

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गुप्तचरों ने भागकर सुग्रीव से कहा कि दो वीर युवक वन में धनुष वाण लिए इधर-उधर भटक रहे हैं। सुग्रीव ने हनुमान जी से कहा कि पता करो वह युवक कौन हैं और क्या चाहते हैं। हनुमान जी ब्राह्मण का वेष बनाकर राम जी के पास पहुंच गए।

हनुमान जी को जैसे ही पता चला कि दोनों युवक राम और लक्ष्मण हैं हनुमान अपने वास्तविक रूप में आ गए। हनुमान जी ने दास भाव से राम जी के चरण पकड़ लिए। राम जी ने हनुमान जी को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया।

रामायण में हनुमान जी को वानर रूप में बताया गया है। लेकिन वानर पेड़ की डाली पर रहते हैं घर बनाकर नहीं रहते। इनका न कोई राज्य होता है और न इनकी राजधानी होती है। जबकि हनुमान जी और सुग्रीव का अपना राज्य था और इनकी प्रजा थी। संभवतः हनुमान और सुग्रीव इसलिए वानर कहे गए हैं क्योंकि यह अनार्य थे और राम आर्य थे।

क्या हनुमान और सुग्रीव वानर थे

ramleela hanuman and ram sugriv friendship

अनार्य मलय पर्वत के पार रहते थे जिसे आज दक्षिण भारत कहा जाता हैं। आर्यों का मानना था कि अनार्य का रहन-सहन वानरों की तरह है उनमें सभ्यता का विकास नहीं हुआ है।

वनों में प्राप्त कंद मूल और शिकार ही इनके जीवन का आधार था। इसलिए आर्य अनार्य में भेद-भाव था। राम ने सीता की तलाश करने के लिए अनार्य हनुमान की सहायता से वानरों के राजा सुग्रीव से मित्रता की।

रामायण में राम जी की सहायता करने वाले नरों को संभवतः इसलिए भी वानर कहा गया है क्योंकि वह वन में रहते थे। वानर का एक अर्थ वन में रहने वाले नर भी होता है।

आर्यों द्वारा मित्रता का समान अधिकार प्राप्त होने के कारण वानरों में राम के प्रति अगाध श्रद्घा और समर्पण का भाव आ गया था। समर्पण और निष्ठा के कारण कथित रूप से वानर कहे जाने वाले अनार्यों ने रावण की विशाल सेना को पराजित करने में भगवान राम की भरपूर सहयता की।

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