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क्या आप राखी की ऐसी कीमत चुका पाएंगे

Sat, 09 Aug 2014 08:02 AM IST
Updated Sat, 09 Aug 2014 08:02 AM IST
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raksha bandhan festival haridwar shanti kunj

रक्षाबंधन भारतीय संस्कृति की महानता का परिचय कराती हैं। वर्तमान समय की विषम परिस्थितियों में जब नारी की अस्मिता पर क्रूर आघात हो रहे हैं, तो इसका महत्त्व और भी अधिक बढ़ जाता है। आज हमें इस पर्व पर यह भी सोचना है कि क्या हम सचमुच बलि राजा को बांधे गए रक्षा सूत्र की तरह अपने बटोरे हुए वैभव की बलि राष्ट्रहित में दे सकते हैं?

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हम राखी बंधवाते हैं और हमारी बहिनें हमसे अपनी राखी की कीमत संजोये बैठी रहती हैं। उनकी अपनी भाइयों से अपने दु:ख दर्द में सहयोग की अपेक्षा भी रहती है और एक हम हैं, जो राखी बंधवाने की औपचारिकता पूरी करते हुए उन्हें कोई भेंट देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री समझ लेते हैं।
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प्राचीन काल में राखी पर ऐसा होता था

raksha bandhan festival haridwar shanti kunj

क्या कभी हम अपनी बहिन की राखी की कीमत उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप समय पर चुका पाते हैं? यह प्रश्र बहुत ही मार्मिक है और अनिवार्य भी। इसी दिन श्रावणी पर्व भी मनाया जाता है। प्राचीन काल के समाज सेवी जो ब्राह्मण कहे जाते थे, इसी दिन पुराने यज्ञोपवीत को बदलकर नवीन यज्ञोपवीत धारण करते थे। वे दस स्नान के माध्यम से अपने भीतर के अहं, लोभ और वासनाओं को मिटाने का हर संभव प्रयास करते थे।

श्रावणी के दिन नये यज्ञोपवीत बदलने का भाव यही है कि पिछले वर्ष जिन आदर्शों के पालन में कमी रही, उन्हें पुन: याद किया जा सके। आज मानवता की रक्षा के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक समाजसेवी या ब्राह्मण अपने व्रत द्वारा ली गयी शिक्षा पर दृढ़ होकर धर्म के प्रति वफादार हो सके, राष्ट्र को जाग्रत् और समर्थ बना सके, इसी उद्देश्य से यह पर्व मनाया जाता है।

तब सही मायने में राखी का त्योहार मनाएंगे

raksha bandhan festival haridwar shanti kunj

श्रावणी पूर्णिमा को श्रावणी का त्यौहार ज्ञान-पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। राष्ट्र को जीवन्त जाग्रत् बनाये रखने का संकल्प प्रत्येक को लेना चाहिए।

साथ ही बहिनों की राखियां सार्थक हों, इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक नारी के सम्मान की रक्षा हम उसे अपनी सगी बहिन की तरह मानकर करें।

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