हर साल वसंत आने का यह रहस्य आप भी जान लीजिए
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‘हरि विलास’ में स्पष्ट ही उल्लेख मिलता है कि वसंत का उद्भव माघ शुक्ल वसंत पंचमी के दिन हुआ। कालिदास के ‘ऋतु संहार’ नामक ग्रंथ में प्रकृति और मानव सौन्दर्य के अनेक पहलुओं का वर्णन किया गया है। ‘रत्नावली’ ग्रन्थ में इसका ‘वसंतोत्सव’ एवं ‘मदनोत्सव’ दोनों ही नामों से उल्लेख मिलता है।
कवियों और विद्वज्जनों ने वसंत को प्रकृति और मनुष्यों के संवेदनशील संबंधों का साकार रूप में वर्णन किया है। संस्कृति और हिन्दी साहित्य की प्रायः प्रत्येक विधा में वसंत पर्व का वर्णन किसी न किसी रूप में किया गया है।
कालिदास, माघ, भारवि आदि संस्कृत कवियों से लेकर वर्तमान संस्कृत-हिन्दी कवियों को भी वसंत के बारे वर्णन करते देखा जाता है। वसंत को ऋतुराज, कामसखा, पिकानन्द, पुष्पमास, पुष्प समय, मधुमाधव आदि नामों से सम्बोधित किया गया है।
वसंत के इस पर्व पर विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के पूजन का भी विधान है। सरस्वती संगीत एवं कला की देवी के रूप में भारतीय संस्कृति और धर्म की आस्था के रूप में चिरकाल से पूजनीय रही है। कवियों और कलाकारों ने देवी सरस्वती को सत्यं-शिवं-सुन्दरम् के उच्चतम भाव से परिपूरित माना है।
माता सरस्वती के अर्चन-पूजन में हमें अज्ञान रूपी अन्धकार में ज्ञान रूपी प्रकाश, निराशा के दुखद क्षण में आशावान और उत्साह का संचार करते हुए एक नवीन स्फूर्ति की अनुभूति होती है। यह सब वसंत पंचमी का ही प्रभाव प्रकृति के माध्यम से मानव मात्र में दृष्टिगोचर होता है।
हमें प्रकृति के प्रति पल परिवर्तित रूप से शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। प्रति वर्ष वसंत के आने का यही रहस्य है कि हम उससे सदा मुस्कराते रहनी की प्रेरणा ग्रहण करें।
इस युग के महान ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी, जिन्हें इस वसंत के ही दिन दिव्य दर्शन हुए, अपने आराध्य गुरुसत्ता से साक्षात्कार हुआ, जीवन में अपनायी जाने वाली गतिविधियों और महत्त्वपूर्ण क्रियाकलापों के बारे में दिशानिर्देश मिले, बहुत से रहस्यों से पर्दा उठा और जीवन निहाल हुआ, उन्होंने सदा मुस्कराते रहने की प्रेरणा दी है। वे कहते थे- जो खिलता-मुस्कराता रहे, वही वसंत है।