यूं ही नहीं कहते कि प्यार में बड़ी ताकत होती है

अध्यात्मिक गुरू/ श्री श्री रविशंकर Updated Tue, 21 Jan 2014 01:08 PM IST
power of love
हम सुबह से रात तक शब्दों को ही जीते हैं। हम इनके पीछे के उद्देश्यों को खोजने में और उद्देश्यता को खोजने में हम सारे उद्देश्य भूल जाते हैं। यह इतना गंभीर हो जाता है कि हम अपनी रातों की नींद ही खो बैठते हैं। हम रात भर उन शब्दों के कारण परेशान हो जाते हैं।

बहुत से लोग रात को सोते समय भी बोलते हैं। यहां पर शब्दों से आराम नही मिल पाता। शब्द ही सभी प्रकार के चिंताओं की जड़ है। बिना शब्दों के तो आप चिंतित ही नही हो सकते। आपकी मित्रता शब्दों की ही देन है। कोई कहता है, ‘‘ओह, आप कितने महान है, आप कितने सुंदर है, आप कितने दयालु हैं; मैंने अपने जीवन में आप जैसा व्यक्ति नही देखा।

मैं पूरे जीवन आप जैसे व्यक्ति को खोज रहा था।‘‘ अचानक आप में प्रेम जागृत हो जाता है। और जब कोई व्यक्ति हम से गलत शब्दों से बात करता है तो हम दुखी हो जाते हैं। लेकिन वे तो शब्द मात्र हैं। जीवन बहुत ही सतही हो जाता है जब हम जीवन को शब्दों पर जीते हैं।

जो कुछ भी जीवन में महत्वपूर्ण है, सारयुक्त है वह तो शब्दों में व्यक्त ही नही किया जा सकता। प्रेम का अनुभव, सही कृतज्ञता शब्दों में व्यक्त नही हो सकते। वास्तविक सौंदर्य और सच्ची मित्रता में शब्द नही होते। क्या हम उस व्यक्ति के साथ जिससे हम प्रेम करते है, कुछ देर मौन में बैठे हैं?

क्या आपको याद आता है कि आप किसी के साथ बैठ कर चुपचाप कार चला रहे हो, या सूर्यास्त को देख कर या सौंदर्य को देख कर, पहाड़ो को देखकर चुप रहे हो? नही, हम अपना मुंह खोल देते हैं। हम बातें करना आरंभ कर देते है और जो सौंदर्य है उसको समाप्त कर देते हैं।

हम पिकनिक मनाने जाएं और वहां पर सौंदर्य देखकर भी बातें करते रहे। हम कार चला रहे हों तब देखों हम कितनी बाते करते हैं। उसमें चार व्यक्ति होते हैं और दो प्रकार की बातचीत चल रही होती है। कभी कभार सभी बातें करने लगते हैं। कोई एक दूसरे को समझ ही नही रहा होता है।

हम अपने मन को शोर से भर लेते हैं। जितना क्रोध अंदर होता है उतना ही कठोर संगीत बाहर हम चलाते हैं क्योंकि ऐसा करना हमे राहत देता है। जितनी शुद्घ हमारी चेतना होती है, जितने हम तनावमुक्त होते है उतना ही हम संगीत के प्रति संवेदनशील होते हैं।

आपकी उपस्थिति ही बता देती है कि आप क्या है। एक महान संत प्रेम पर अपना प्रवचन दे देगा और आपको वह अनुभव ही नही होगा। यदि आप वहीं पर हो और प्रेम में हो तो आपको सब पता चलेगा। अपने भीतर बैठे, ध्यान करे, कुछ देर मौन में रहें और अनुभव करें कि आप प्रेम में है।

आप जिस तत्व के बने है उसे प्रेम कहते हैं। शब्दों के परे ही प्रेम है। सहज रहें, अबोध रहें और आप देखेगें कि प्रेम की शक्ति से सारे काम स्वतः ही हो जाते हैं।

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