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जब महावीर जैन ने बताया क्यों देवताओं की छाया भूमि पर नहीं बनती
सुदर्शनसिंह
Updated Tue, 06 Sep 2016 11:21 AM IST
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महावीर जैन
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राजगृह नगर में रौहिणेय नामक एक चोर रहता था। उसके पिता ने मरते समय कहा था कि तुम्हें अपने व्यवसाय में सफल होना है, तो जहां कहीं भी कथा-कीर्तन और साधुओं के उपदेश हों, वहां मत जाना। ऐसे स्थान पर जाना ही पड़े, तो कान बंद रखना।’संयोग की बात कि रौहिणेय एक बार कहीं जा रहा था। उसने देखा कि मार्ग में बहुत से लोग एकत्र हैं। पास पहुंचने पर पता चला कि श्रमण महावीर स्वामी उपदेश कर रहे हैं। रौहिणेय ने चौंककर अपने दोनों कानों में उंगलियां डाल लीं।
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लेकिन उसी समय उसके पैर में कांटा चुभ गया। उसने एक हाथ से वह कांटा निकाला। इस बीच तीर्थंकर के उपदेश का यह अंश कानों में पहुंच ही गया कि 'देवताओं के शरीर की छाया नहीं पड़ती। वे पृथ्वी से चार अंगुल ऊपर ही रहते हैं।’रौहिणेय वहां से तुंरत दूर हट गया। थोड़े दिनों पीछे वह चोरी के अपराध में पकड़ा गया। राजकर्मचारी उसे ढूंढ रहे थे; किंतु पकड़ लेने पर भी उसे पहचान न सके। रौहिणेय को पहचानता कोई नहीं था और मारने-पीटने पर पर भी वह तमाम कोशिशों के बावजूद अपने बारे में कोई परिचय दे नहीं रहा था।
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राजकर्मचारियों ने उसे औषध देकर मूर्छित कर दिया और उसे एक उपवन में रख आए। रौहिणेय की बेहोशी दूर हुई, तो अपने चारों ओर का दृश्य देखकर चकित रह गया। उस उपवन में मणिजटित मंडप थे। अद्भुत वृक्ष थे और बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से भूषित स्त्रियां गाती-बजाती एवं नाचती थीं। उन स्त्रियों ने चोर से कहा कि सौभाग्य की बात है कि आप स्वर्ग पधारे! आप धरती पर आप किस नाम से जाने जाते थे। यहां देवलोक में छल करना या झूठ बोलना वर्जित है। ऐसा व्यक्ति तत्काल वापस भेज दिया जाता है।’सुनकर रौहिणेय चौंका।
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वह अपना परिचय देने ही जा रहा था कि उसे उस दिन के तीर्थंकर के मुंह से सुने वचन स्मरण हो आए-‘इनके शरीरों की छाया पड़ रही है और ये भूमि पर ही खड़ी हैं।’उसके मन में विचार कौंधा कि 'जिस एक वाक्य के सुनने से मुझे इतना लाभ हुआ, उन तीर्थंकर के चरणों में ही मुझे अपने को अर्पित करना चाहिए।’रौहिणेय के विचारों का राजा ने सम्मान किया। उसे माफी मिल गई और रौहिणेय ने चोरी छोड़कर दीक्षा ग्रहण की।