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आशीर्वाद में मिला काला धागा, पल में हुआ निहाल

Thu, 11 Aug 2016 06:18 PM IST
ओशो
ओशो Updated Thu, 11 Aug 2016 06:18 PM IST
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osho vani story of bulle shah
काला ध्‍ाागा

संत जगजीवन दास का काम था गाय बैल चराना। वह गरीब के बेटे थे। उनके पिता छोटे-मोटे किसान थे। जगजीवन दास को न पढ़ने का मौका मिला, न पढ़ने का सवाल उठा। एक दिन अनूठी घटना घटी। वह चराने गए थे गाय-बैल। दो मस्‍त फकीर वहां से गुजरे। वे वहीं उनेक पास वृक्ष के नीचे सुस्ताने बैठ गए। उनमें एक थे बाबा बुल्ले शाह, दूसरे थे गोविंद शाह। दोनों मस्‍त बैठे थे। जगजीवन भी वहीं बैठ गया। वह छोटा बच्‍चा था। बुल्‍लेशाह ने कहा, बेटे आग की जरूरत है, थोड़ी आग ला दे। वह भागा। वह इसकी ही प्रतीक्षा करता था कि कोई आज्ञा मिल जाए, सेवा का कोई मौका मिल जाए।

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जगजीवन दास सिर्फ आग ही नहीं लाया, साथ में दूध की एक मटकी भी साथ में भर लाया। उसे लगा, दोनों भूखे-प्यासे होंगे। दोनों ने अपने हुक्के जलाए। बच्चा दूध ले आया, तो उन्होंने दूध पिया। लेकिन बुल्‍लेशाह ने जगजीवन से कहा कि दूध तो तू ले आया, पर मुझे ऐसा लगता है क‌ि तू बिना बताए चुपके से ले आया है। बात थी भी सच। जगजीवन चुपचाप दूध ले आया था, मां को उसने इस बारे में कहा भी नहीं था। शायद घर पर कोई नहीं होगा। कहने का मौका नहीं मिला होगा। वह थोड़ी ग्‍लानि अनुभव करने लगा था। बुल्ले शाह ने उससे कहा, घबड़ा मत, जरा भी चिंता मत कर। जो देता है उसे बहुत मिलता है।
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जगजीवन ने बुल्‍लेशाह से कहा, मेरे स‌िर पर हाथ रख दें, सिर्फ मेरे सर पर हाथ रख दें। बुल्ले शाह ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की क‌ि तू लौट जा, अभी उम्र नहीं है तेरी संन्यासी बनने की। पर जगजीवन नहीं माना, वह जिद करता रहा। बुल्लेशाह ने जगजीवन के सिर पर हाथ रखा और अपने हुक्के में से एक सूत का काला धागा खोलकर उसके दाएं हाथ पर बांध दिया। गोविंद दास ने भी अपने हुक्‍के का एक सफेद धागा खोलकर उसके बाएं हाथ पर बांध दिया। जगजीवन मुक्‍त हो गए।

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