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आप भी पुराने कपड़ों में होली खेलते हैं तो खबर जरुर पढ़ें
ओशो/अध्यात्मिक गुरु
Updated Thu, 13 Mar 2014 12:44 PM IST
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आपने देखा होगा कि होली के मौके पर लोग रंग खेलने के लिए पुराने कपड़े पहनकर दोस्तों के बीच आते हैं। जबकि अमेरिका और दूसरे विकसित देशों में मनाए जाने वाले होली में लोग नए कपड़े पहनकर होली का आंनद होली लेते हैं।
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इस पर ओशो का कहना है कि संपन्न समाज में उत्सव प्रवेश कर सकता है, गरीब समाज में उत्सव प्रवेश नहीं कर सकता। गरीब समाज में उत्सव धीरे-धीरे विदा होता जाता है। या कि उत्सव भी फिर एक काम बन जाता है।
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गरीब समाज उत्सव भी मनाता है, दीवाली भी मनाता है, तो कर्ज लेकर मनाता है। होली भी खेलता है तो पिछले वर्ष के पुराने कपड़े बचाकर रखता है। होली के दिन फटे-पुराने कपड़ों को सिलाकर निकल आता है।
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अब जब होली ही खेलनी है तो फटे-पुराने कपड़ों से खेली जा सकती है। तो मत ही खेलो। होली का मतलब ही यह है कि कपड़े इतने ज्यादा हैं कि रंग में भिगोए जा सकते हैं।
लेकिन, गरीब आदमी भी होली तो खेलेगा, लेकिन वह पुराने ढांचे को ढो रहा है सिर्फ। नहीं तो होली के दिन, जो सबसे अच्छे कपड़े थे, वही पहन कर निकलते थे लोग।
उसका मतलब ही यह था। उसका मतलब ही यह था कि इतने अच्छे कपड़े हैं, तुम रंग डालो! लेकिन जिससे हम रंग डलवाने जा रहे हैं, उसको भी धोखा दे रहे हैं।
कपड़ा पुराना, सी-सी कर आ गए हैं, धुलवा कर आ गए हैं। वह रंग डालने वाले को भी धोखा दे रहे हैं। रंग डालने का मतलब ही क्या था?
जिन लोगों ने कपड़ों पर रंग डालने का खेल-खेला होगा, उनके पास कपड़े जरूरत से ज्यादा रहे होंगे, अन्यथा नहीं खेल सकते हैं यह खेल। हम भी खेल रहे हैं, लेकिन हमारा खेल सिर्फ एक ढोना है एक परंपरा को।
इसलिए दिल दुखता है। होली के दिन कोई कपड़े पर रंग डाल जाता है तो दिल दुखता है। दिल खुश होना चाहिए कि किसी ने रंग डालने योग्य माना, लेकिन दिल दुखता है।
दुखेगा, क्योंकि कपड़े भारी महंगे पड़ गए हैं, अब कपड़े इतने आसान नहीं रह गए हैं।
हां, पश्चिम में होली खेली जा सकती है। अभी कृष्ण का नृत्य चल रहा है, आज नहीं कल होली पश्चिम में प्रवेश करेगी, इसकी घोषणा की जा सकती है।
पश्चिम होली खेलेगा। अब उनके पास कपड़े हैं, रंग भी है, समय भी है, फुर्सत भी है, अब वे खेल सकेंगे। और उनकी होली में एक आनंद होगा, उत्सव होगा, जो हमारी होली में नहीं हो सकता।
संपन्नता से मेरा मतलब है, ऑन द होल, पश्चिम का समाज संपन्न हुआ है। और जब पूरा समाज संपन्न होता है, तो जो उस समाज में दरिद्र होता है वह भी उस समाज के संपन्न से बेहतर होता है जो समाज दरिद्र होता है।
यानी आज अमरीका का दरिद्रतम आदमी भी पैसे पर उतना पकड़ वाला नहीं है, जितना हिंदुस्तान का संपन्नतम आदमी है।
हिंदुस्तान के अमीर से अमीर-आदमी की पैसे पर पकड़ इतनी ज्यादा है, होगी ही, क्योंकि चारों तरफ दीन-दरिद्र समाज है। अगर वह जोर से न पकड़े तो कल वह भी दीन-दरिद्र हो जाएगा।
साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन
पुस्तक: कृष्ण स्मृति, प्रवचन-13
परिचय
ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर 1931 को मध्य प्रदेश में रायसेन जिला के अंतर्गत कुचवाड़ा ग्राम में हुआ। ओशो अपने पिता की ग्यारह संतान में सबसे बड़े थे। 1960 के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' एवं 'ओशो भगवान श्री रजनीश' नाम से जाने गये।
ओशो ने सम्पूर्ण विश्व के रहस्यवादियो, दार्शनिको और धार्मिक विचारधाराओं को नवीन अर्थ दिया। अपने क्रान्तिकारी विचारों से इन्होने लाखों अनुयायी और शिष्य बनाये। 19 जनवरी 1990 को ओशो परमात्मा में विलीन हो गये।