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आखिर ओशो ने क्यों कहा, प्रेम में होना मृत्यु है?

Thu, 19 Jun 2014 01:08 PM IST
अध्यात्मिक गुरु/ओशो
अध्यात्मिक गुरु/ओशो Updated Thu, 19 Jun 2014 01:08 PM IST
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osho pravachan on love

प्रेम परमात्मा की और तुम्हारी आंखें खोलता है। वह महान प्रसन्नता लाता है, पर इसके ही साथ वह बहुत बड़ा भय भी लाता हैः क्योंकि तुम्हारा अहंकार मिट रहा है। और तुमने इस अहंकार या अस्मिता में बहुत अधिक पूंजी लगा रखी है। तुम उसी के लिए जीते रहे हो, तुम्हें उसके लिए सिखाया और तैयार किया गया है।

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तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे पुरोहित, धर्माचार्य, तुम्हारे राजनीतिज्ञ तुम्हारे स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय और तुम्हारी शिक्षा ये सभी मिलकर तुम्हारे अहंकार का सृजन करते रहे हैं। वे तुममें महत्वाकांक्षा उत्पन्न करते रहे हैं, और ये सभी महत्वाकांक्षाओं के द्वारा स्वयं अपने को ही अपंग पाओगे और स्वयं को अंहकार के पिंजरे में कैद पाओगे।
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तुम बहुत अधिक दुःख उठाते हो लेकिन अपने पूरे जीवन मे तुम्हें यही सिखाया गया है कि यह मूल्यवान है, इसलिए तुम उससे लिपट जाते हो- तुम दुःख भी भोगते हो और तुम उससे लिपटे भी रहते हो। और तुम जितने अधिक लिपटते हो उससे, तुम उतने ही अधिक दुःख और कष्ट भुगतते हो।
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वहां ऐसे भी क्षण होते हैं, जब परमात्मा आता है और तुम्हारा द्वार खटखटाता है। यह वह प्रेम ही है- जो परमात्मा बनकर तुम्हारा द्वार खटखटा रहा है। हो सकता है एक स्त्री के द्वारा एक पुरुष के द्वारा, एक बच्चे के प्रेम के द्वारा एक फूल के द्वारा ,सूर्योदय अथवा सूर्यास्त के द्वारा..

परमात्मा लाखों तरह से द्वार खटखटा सकता है। लेकिन जब कभी भी परमात्मा द्वारा खटखटाता है, तुम भयभीत हो जाते हो। पुरोहित, धर्माचार्य, राजनीतिज्ञ, माता-पिता और इन सभी के द्वारा सृजित अहंकार--यह सभी दांव पर लगे होते हैं। ऐसा अनुभव होने लगता है कि जैसे तुम मर रहे हो।

तुम रुक जाते हो। तुम पीछे हट जाते हो। तुम अपनी आंखें बंद कर लेते हो, तुम अपने कान बंद कर लेते हो, तुम खटखटाने की आवाज सुनते ही नहीं। तुम अपनी मांद में वापस लौटकर गुम हो जाते हो। तुम अपने द्वार बंद कर लेते हो।

प्रेम, मृत्यु जैसा लगता है--और वह है। और वे लोग वास्तव में आध्यात्मिक आनंद पाना चाहते हैं, तो उन्हें उस मृत्यु से होकर गुजरना होगा क्योंकि पुनर्जीवन केवल मृत्यु के द्वारा ही सम्भव है। जीसस ठीक ही कहते हैं कि तुम्हें अपने क्रांस को स्वयं अपने ही कंधों पर ढोना होगा। तुम्हें मरना ही होगा। वह कहते हैं: ‘‘जब तक तुम्हारा पुनर्जन्म नहीं होता, तुम मेरे राज्य को न देख सकोगे, और तुम वह नहीं समझोगे, जो मैं तुम्हें सिखा रहा हूं।’’ और वह कहते हैं: ‘‘प्रेम ही परमात्मा है’’ वह ठीक कहते हैं क्योंकि प्रेम ही प्रवेषद्वार है।

प्रेम में मर जाना, यह अहंकार में जीने के स्थान पर कहीं अधिक सुंदर है। अहंकार में जीने की अपेक्षा, सत्य में मर जाना कहीं अधिक सत्य है। अहंकार में बिताये जीवन से प्रेम में हुई मृत्यु अच्छी है। अहंकार में मरना, प्रेम में जीना है। स्मरण रहेः जब तुम अहंकार को चुनते हो, तो तुम वास्तविक मृत्यु को चुन रहे हो--क्योंकि प्रेम में होना एक मृत्यु है।


और जब तुम प्रेम को चुन रहे हो, तो केवल झूठी मृत्यु को चुन रहे हो, क्योंकि अहंकार में मरने से तुम कुछ भी नहीं खो रहे हो-- तुम्हारे पास बिलकुल प्रारम्भ ही से कुछ भी नहीं था।
साभार
ओषो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली

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