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तब आप जीते जी मौत की झलक पा सकते हैं

Fri, 17 Oct 2014 12:53 PM IST
Updated Fri, 17 Oct 2014 12:53 PM IST
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osho pravachan on life and death

किसकी प्रतीक्षा कर रहे हो, मौत के अतिरिक्त कोई भी नहीं आएगा। किन सपनों में खोए हो! इसे हम समझें। जीवन को हमने देखा नहीं, हमने बड़े सपनों की बारात सजायी है।

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हम किस दुल्हन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विवाह रचाने की बड़ी योजना बना रखी है। हम खूब-खूब कल्पना किये बैठे हैं-ऐसा हो, ऐसा हो। इसकी वजह से हम देख नहीं पाते कि कैसा है! तुम्हारा रोमांस, तुम्हारा कल्पनाओं की जाल सत्य को प्रगट नहीं होने देता।
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आंख खाली करो, जरा सतेज होकर देखो, जरा सपनों को किनारे हटाकर देखो। वही देखो, जो है। तो तुम्हें पैदा होते बच्चे में मरता हुआ आदमी दिखायी पड़ेगा। तो तुम्हें सुदंरतम देह के भीतर बुढ़ापा कदम बढ़ाता हुआ मालूम होगा।
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जो गहरे देखेगा, वह जीवन में मौत को देख लेगा। यही बुद्ध कहते हैं कि जरा गहरे देखो, चमड़ी के धोखों में मत आ जाओ। जरा और गहरे उतरो, जरा भीतर का दर्शन करो।

मौत केवल उसी दीए को नहीं बुझा पाती

osho pravachan on life and death

अंधेरा रोज बढ़ता चला जाता है। किस भरोसे बैठे हो? तुम्हारे अतिरिक्त कोई भी दीए को न जला सकेगा। फिर अंधेरी रात घेर लेगी और फिर बहुत तड़पोगे और पछताओगे क्यों दिन का उपयोग न कर लिया? क्योंकि दिन के उजाले में चाहते तो दीया जल जाता।

बुद्ध कहते हैं, जीवन का बस इतना ही उपयोग हो सकता है कि ध्यान का दीया जला लो, बस इतना ही जीवन का उपयोग है। तुमने पद, धन, यश, कीर्ति, प्रेम इन सबकी चेष्टाएं कीं, बस एक ध्यान के दीए को जलाने की चेष्टा नहीं की, वही काम आएगा। मौत केवल उसी दीए को नहीं बुझा पाती। बुद्ध कहते हैं, ध्यान भर अमृत सूत्र है।

लेकिन मौत की तो किसी से बात ही करो तो लोग नाराज हो जाते हैं। बुद्ध से भी लोग बहुत नाराज हुए, क्योंकि बुद्ध मौत की ही बात करते हैं। अब कोई शादी को जा रहा हो और तुम उससे मौत की बात करो! कोई दिल्ली की तरफ जा रहा हो, और तुम मौत की बात करो! वह कहेगा, ठहरो, अभी ये बातें न करो। पैर डगमगाए देते हो।

जवान आदमियों को बुद्घ ने दिखाया अपना बुढापा

osho pravachan on life and death

बुद्ध ने जब मौत और दुख की बातें शुरू की, तो लोग नाराज ही हुए। लोग घबड़ाए कि यह आदमी पैर के नीचे जमीन खींचे लेता है। और इसने खींची, बहुत लोगों के पैर के नीचे की जमीन खींच ली।

जवान आदमियों को बुढ़ापे का दर्शन दे दिया। अभी जिदंगी की रौ में थे, उनके पैर से जमीन खींच ली और मौत के गढ्डे में ढकेल दिया।

मगर जो इसके साथ चलने को राजी हो गए, जिन्होंने दुख की हिम्मत की कि करेंगे साक्षात्कार, जिन्होंने पीड़ा से मुंह न मोड़ा-सन्मुख होने की चेष्टा की, उन्होंने खूब पाया, उन्होंने खूब ज्योति जलायी।

दीए ही नहीं, मशालें जला लीं। और कुछ ऐसी रोशनी जलायी जो फिर कभी नहीं बुझती। उन्होंने वास्तविक जीवन को पा लिया।

साभार: ओशो वल्र्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली

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