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नए साल में शान्ति और समृद्धि पाने के सात उपायः श्री श्री रविशंकर

नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Tue, 29 Jan 2013 02:23 PM IST
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नववर्ष पर सब के होठों पर खुशी, शांति और समृद्धि पाने की कामना रहती है, लेकिन शांति का मतलब क्या हमें सच में पता है? शांति हमारे भीतर है। बीते साल से गुजरकर नए साल में प्रवेश करते हुए, चलो हम सब इस आतंरिक शांति के प्रति सजग रहने का संकल्प लें और अपनी मुस्कान को अपने अंदर की सच्ची समृद्धि की पहचान बना लें। ऐसा करने के सात उपाय हैं-
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1. दिव्यता पर भरोसा रखो  
इस वर्ष, अपनी भक्ति को पूरी तरह खिलने दो और उसे अपने काम आने का मौका दो।हमारे प्यार, विश्वास, और आस्था की जड़ों को गहरा होना चाहिए, और फिर सब कुछ अपने आप होने लगता है। "मैं धन्य हूँ" की भावना तुमको किसी भी असफलता से उबरने में मदद कर सकती है। जब तुमको समझ में आ जाएगा कि तुम वाकई में धन्य हो तो तुम्हारी सभी शिकायतें और असंतोष खत्म हो जायेगा, और तुम असुरक्षित न महसूस करते हुए आभारी, तृप्त और शांतिपूर्ण बन जाओगे।

2. खुद के लिए समय निकालो
तुम रोज़ केवल जानकारी जुटाने में लगे रहते हो और अपने लिए सोचने और चिंतन करने के लिए समय नहीं निकालते। उसके बाद तुम्हें सुस्ती और थकान महसूस होती है। मौन के कुछ क्षण तुम्हारी रचनात्मकता के स्रोत हैं। मौन तुमको स्वस्थ और पुनर्जागृत कर देता है और तुमको गहराई और स्थिरता देता है। कुछ समय दिन में अपने साथ बैठो, अपने दिल की गहराइयों में झाँको, आँखें बंद कर के दुनिया को एक गेंद की तरह लात मार दो।अपने लिए कुछ समय देने से तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता में सुधार आएगा।

3. जीवन की नश्वरता को जानो
इस जीवन की नश्वरता को देखो। लाखों साल निकल गए हैं और लाखों आयेंगे और चले जायेंगे। कुछ भी स्थायी नहीं है। तुम्हारा जीवन क्या है?  सागर की एक बूंद जितना भी नहीं। जाग जाओ और पूछो, मैं कौन हूँ? मैं इस ग्रह पर कैसे हूँ? मेरा जीवन अंतराल कितना है? सजगता आ जायेगी और तुम छोटी छोटी चीज़ों के बारे में चिंता करना बंद कर दोगे। छोटेपन को छोड़कर तुम अपने जीवन के हर पल को जीने में सक्षम हो जाओगे। जब तुम अपने जीवन के संदर्भ की समीक्षा करते हो तो तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता में सुधार आता है।

4. परोपकार के कार्य करो
दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो जाओ।परोपकार के कुछ ऐसे कृत्य करो जिनके बदले में तुम्हें कुछ भी पाने की चाह न हो।केवल सेवा से ही जीवन में संतोष आता है। इससे अपनेपन की भावना पैदा होता है। जब अपनी नि: स्वार्थ सेवा से तुम किसी को राहत देते हो, तो उनकी शुभ कामनाओं का स्पंदन तुमको मिलता है। अपने दयालु स्वभाव को अभिव्यक्त करने से तुम्हारा प्रेम स्वरुप और शान्ति स्वरुप उजागर होता है।

5. अपनी मुस्कान को सस्ता बनाओ
हर दिन, हर सुबह, आईने में देखो और अपने आप को एक सुन्दर सी मुस्कान दो। कोई भी तुम्हारी मुस्कान को छीन न पाए। आमतौर पर, तुम अपने गुस्से को मुफ्त में बाँटते रहते हो और बड़ी मुश्किल से शायद कभी ही मुस्कान देते हो जैसे वह कोई बड़ी कीमती अमानत हो। अपनी मुस्कान को सस्ता करो और क्रोध को महंगा! मुस्कुराने से तुम्हारे चेहरे की सभी मांसपेशियों को आराम मिलता है। तुम्हारे दिमाग की नसों को आराम मिलता है और तुम भीतर से शांत हो जाते हो। यह तुमको जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मविश्वास, साहस, और ऊर्जा देता है।

6. ध्यान को अपने जीवन का एक अंग बनाओ
जब हम जीवन में ऊंची महत्वाकांक्षाएं रखते हैं तो उनसे तनाव और बेचैनी आती है जो केवल ध्यान और आत्मनिरीक्षण के कुछ मिनटों के माध्यम से समाप्त किया जा सकता है। ध्यान से हमें गहरा विश्राम मिलता है। तुम जितना गहरा विश्राम कर पाओगे, तुम उतना ही गतिशील गतिविधियों को कर पाओगे। ध्यान क्या है?

खलबली के बिना मन ध्यान है।
वर्तमान क्षण में ठहरा हुआ मन ध्यान है।
बिना किसी हिचक और बिना किसी चाह का मन ध्यान है।
अपने आनंदमयी और शांतिमय स्रोत की ओर घर लौट चला हुआ मन ध्यान है।

7. हमेशा एक शिष्य रहो
यह जान लो कि तुम हमेशा एक शिष्य रहोगे। किसी को भी कम मत समझना।तुम्हें किसी भी कोने से ज्ञान मिल सकता है। प्रत्येक अवसर तुमको सिखाता है और प्रत्येक व्यक्ति तुमको कुछ सिखाता है।यह पूरी दुनिया तुम्हारी शिक्षक है। जब तुम हमेशा जानने के लिए तत्पर रहोगे, तो तुम दूसरों को कम समझना  बंद कर दोगे। विनम्रता तुम्हारे जीवन में आ जायेगी।
आप सबको एक बहुत आनंदमय और शांतिपूर्ण नववर्ष की शुभ कामनाएं।

स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग


श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।

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