तंत्र साधना और सिद्घियां हासिल करने वाले करते हैं इस दिन का इंतजार
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नवरात्रि में देवशक्तियां स्वर्ग से धरती पर उतरती और अपने माध्यम चुनती हैं। संस्कारी आत्माओं के भीतर समुद्र मंथन जैसी हलचलें उभरती हैं। वे उन्हें अर्जित व्यवस्थित कर लेती हैं और वैसी ही रत्नराशि जैसी सिद्धियां पा लेती हैं। वे अनुभव करती हैं कि सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह चेतना को प्रभावित करते हैं। सूर्य के उदय और अस्त होते समय आकाश में लालिमा छाई रहती है।
उस अवधि के पूरा होते ही वह दृश्य भी तिरोहित होने लगता है। इसे काल प्रवाह का उत्पादन कह सकते हैं। ऐसे अप्रत्याशित अवसर तो यदाकदा ही आते हैं पर नवरात्रि के दिनों अनायास ही ऐसी हलचलें उठती हैं, लगता है मानो अदृश्य से अप्रत्याशित अनुदान बरस रहा हो।
ऐसे ही तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ऋषियों, मनीषियों ने नवरात्रि में साधना का अधिक महत्व बताया है। इस बात पर जोर दिया है कि दूसरे अवसरों पर नहीं हो सके तो भी नवरात्रि में आध्यात्मिक तप साधना तो करना ही चाहिए। तंत्र विज्ञान के अधिकांश कर्म इन्हीं दिनों संपन्न होते हैं।
इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते हैं मांत्रिक और तांत्रिक
वाम मार्गी साधक अभीष्ट मंत्र सिद्ध करने के लिए इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते हैं। इन दिनों विशेष संभावना रहती है कि अदृश्य लोकों से बरसने वाले उस अनुदान को पाकर देव मानवों का समुदाय अधिक प्रखर हो जाए।
नवरात्रि पर्व का, ऋतु संध्या का-मुहूर्त विज्ञान की दृष्टि से ही नहीं, साधना पद्धति के कारण भी महत्त्व है। जो लोग दैनिक उपासना नहीं करते, उनसे भी अपेक्षा की जाती है कम से कम इन दिनों तो कुछ नियम निभाएं। इन अभ्यासों के लिए भी कई प्रकार की सरल साधनाओं की विशेष व्यवस्था की जाती है। साधना उपासना का कम ज्यादा होना उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितना उनका नियमित होना।
नियमित साधना को अनुष्ठान भी कहते हैं। उसके साथ व्रत नियमों का अनुशासन जुड़ जाने से वे अनुष्ठान पुरश्चरण बन जाते हैं। उपासना से आत्म कल्याण की और जीवन साधना की प्रगति इसी निष्ठा और नियमितता के सहारे संपन्न होती रही है।
सज्जनों की संगठित सृजन चेतना ही शुभ और शिव परिवर्तन का कर्णधार बनती है। राम काल के रीछ वानर, कृष्ण काल के ग्वाल-बाल, बुद्ध के भिक्षु सहयोगी, गांधी के सत्याग्रही यही प्रमाणित करते हैं कि सज्जनों की सहकारिता के बिना कोई चारा नहीं।
इस योग्य बनाने का नाम साधना है
देवताओं की संयुक्त शक्ति, दुर्गा ने ही उन्हें असुरों के त्रास से छुड़ाया था। ऋषियों का संचित रक्त घट ही सीता को जन्म देने और दानवी विभीषिकाओं को परास्त करने में आधारभूत कारण बना था।
इन पुराण गाथाओं से यही प्रेरणा मिलती है कि आन्तरिक प्रखरता जगाने के भाव भरे प्रयास चलें। भगवान कोई शरीर के रूप में नहीं उतरते। वे लोगों की भाव चेतना में उभरते और उन्हें ही अपना माध्यम बनाते हैं।
अपने चित्त और चिंतन को इस योग्य बनाने का नाम ही साधना है, जिसमें दैवी प्रेरणा उतरें और वह सामर्थ्य भी आए जिसमें अपना कलेवर बहुत मामूली दिखते हुए भी परमात्मा के सौंपे हुए कामों को सहज ही कर सके। नवरात्रि उसी परिवर्तन और वातावरण का आह्वान है।