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अपनी कमाई पर केवल खुद का हक मानते तो संभल जाइए

Fri, 06 Feb 2015 03:23 PM IST
हनुमान प्रसाद पोद्दार
हनुमान प्रसाद पोद्दार Updated Fri, 06 Feb 2015 03:23 PM IST
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money in sprituality

धन संपदा को भगवान की कृपा मानकर सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। वह अपना नहीं, प्राणिमात्र का अधिकार मानना चाहिए। धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि अर्जित धन का सभी पात्रों को प्राप्त हिस्सा देकर बचे हुए को अपनी सुख सुविधा के लिए उपयोग करना चाहिए।

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जो केवल अपने लिए ही कमाता, खाता है वह पाप करता है। धन की तीन गतियां शास्त्रों में बताई गई हैं- दान, भोग और नाश। जो धन को ऐश करने का साधन मानता है, उसे आपदाओं से घिरना पड़ता है। गलत तरीकों से अर्जित अधिक संपत्ति विपत्ति का कारण बनती है।
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धनिक वर्ग में जो पापाचार, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, उसका एक कारण अधर्म से कमाया धन भी है। इसलिए सात्विक साधनों से अर्जित किए गए धन का ही कुछ अंश दान सेवा परोपकार में लगाने का विधान किया गया है। दान, सदाचार व त्यागवृत्ति से ही धन की पवित्रता बनी रहती है।
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हमारा जो भी है सब भगवान का है। जहां दुख, अभाव दिखे वहां आगे बढ़कर लोगों की मदद करनी चाहिए। चूंकि भगवान का है, इसलिए वह उन्हीं का पुण्य प्रसाद है। उसे प्रसाद की तरह ही ग्रहण और बांटना चाहिए।

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