ओशो जन्मोत्सव पर सिखाई गईं ध्यान विधियां
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ओशोधाम में 11 दिसम्बर को ओशो जन्मोत्सव मनाया गया है। नव संन्यास की परिभाषा गढ़ने वाले आध्यात्मिक गुरू आशो के जन्मदिवस पर आयोजित कार्यक्रम में ओशो के 600 से अधिक अनुयायियों एवं संन्यासियों ने भाग लिया। ओशो के जन्म दिवस पर आयोजित कार्यक्रम पांच दिनों तक चला। कार्यक्रम का आरंभ 6 दिसम्बर को शाम 6:30 बजे हुआ जिसका समापन 11 दिसम्बर की संध्या-सत्संग के साथ हुआ।
पांच दिवसीय ओशो जन्मोत्सव ध्यान शिविर का संचालन माँ योग नीलम, माँ धर्म ज्योति तथा स्वामी रविन्द्र भारती के सान्निध्य में हुआ। इस ध्यान शिविर की शुरूआत हर दिन प्रातः 7 से 8 बजे होती थी। जिसमें ओशो के अनुयायी सक्रिय ध्यान क्रिया करके आत्मिक सुख का आनंद प्राप्त करते थे।
सक्रिय-ध्यान पर ओशो ने अपने प्रवचनों में कहा है: ‘‘ध्यान एक ऊर्जा की घटना है। सभी प्रकार की ऊर्जाओं के संबंध में एक आधारभूत बात समझ लेनी है, और यह समझने के लिए मूलभूत नियम है कि ऊर्जा दो विपरीत ध्रुवों में बहती है। केवल यही एक ढंग है उसके बहने का; और कोई दूसरा ढंग नहीं है उसके बहने का। वह द्वंद्वात्मक ध्रुवों में बहती है।’’
दिन के सत्र में अनेकों ध्यान-विधियां होती थी। ओशो ने जागरण की दो शक्तिशाली विधियां बताई हैं-सक्रिय ध्यान तथा कुंडलिनी। ध्यान क्रिया के साथ ही साथ हर दिन 6:30 बजे संध्या सत्संग का आयोजन किया गया जिसमें भाग लेकर संन्यासियों और अनुयायियों ने ज्ञान अमृत का लाभ प्राप्त किया।