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सीख: हम जैसा सोचते हैं, धीरे-धीरे वैसा ही बन जाते हैं
संपादकीय डेस्क, अमर उजाला
Updated Mon, 23 Jul 2018 03:57 PM IST
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चाचा की कहानी, जिसने थोड़े दिनों के लिए आकर नीलांश की नीरस जिंदगी में नए अर्थ भर दिए।
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नीलांश पिछले कुछ साल से बहुत गंभीर नजर आता था। उसके साथी उसे घूमने जाने को कहते, पर वह मना कर देता। वह रोज थककर घर लौटता, हाथ-मुंह धोकर थोड़ा आराम करता, खाना खाता, थोड़ी देर टीवी देखता और फिर सो जाता। एक दिन नीलांश के चाचा उसके घर आए। वह जिंदादिल इंसान थे, इसलिए उनके आते ही घर का माहौल बदल गया। वह रोज सबको अपने साथ कहीं न कहीं घुमाने ले जाते थे। नीलांश भी चाचा के साथ अपने बचपन की यादों को साझा किया करता था। शादी से पहले नीलांश अपने चाचा के साथ खूब मस्ती किया करता था। लेकिन वह विदेश चले गए, तो इधर नीलांश अपने काम और घर में व्यस्त रहने लगा था।
पर चाचा जब रोज उससे घूमने जाने के लिए कहते, तो वह उन्हें मना भी नहीं कर पाता था। नीलांश के बच्चों ने अपने पिता का यह रूप कभी नहीं देखा था। लेकिन चाचा के लिए तो यही उसका असल स्वरूप था। चाचा ने एक दिन नीलांश से पूछा, क्या बात है? मुझे पता चला है कि तुम आजकल बहुत गंभीर रहते हो। कहीं आते-जाते नहीं। बच्चों के साथ भी नहीं खेलते। नीलांश बोला, चाचा, आपको तो पता ही है कि अब काम और जिम्मेदारियों से फुरसत कहां। चाचा बोले, ऐसा जान पड़ता है, जैसे तुम मेरे चाचा हो गए हो।
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नीलांश यह सुनकर सकपका गया। चाचा बोले, हम मस्ती करना और खेलना-कूदना इसलिए नहीं बंद कर देते कि बूढ़े हो गए हैं। बल्कि हम बूढ़े इसीलिए हो जाते हैं, क्योंकि हम मस्ती करना बंद कर देते हैं। शरीर के बूढ़े होने को हम नहीं रोक सकते। पर मन को बूढ़े होने से रोकने का विकल्प है हमारे पास। तुम्हारे पास अभी पूरा जीवन बचा है। अब यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम उसे नष्ट कर दो, या फिर नए सपने देखो। उस दिन से नीलांश का जीवन बदल गया।
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