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देवी लक्ष्मी कमल के आसान पर क्यों विराजती हैं?

Wed, 22 Oct 2014 11:45 AM IST
डॉ० प्रणव पण्ड्या/शांतिकुंज, हरिद्वार
डॉ० प्रणव पण्ड्या/शांतिकुंज, हरिद्वार Updated Wed, 22 Oct 2014 11:45 AM IST
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laxmi pooja deepawali for nation

कार्तिक मास की अमावस्या को दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है। प्राचीन काल में यह श्रावणी फसल के तैयार होने की खुशी में शारदीय नव-सस्येष्टि के नाम से मनाया जाता था। ‘नवसस्येष्टि’ का अर्थ है नए अन्न के लिए यज्ञ। इसके अतिरिक्त वर्षाकाल में घर के अंदर एवं बाहर जो विकृति या कुरूपता आ जाती है, उसे दूर करना भी इस त्योहार का एक मुख्य उद्देश्य है।

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दीपावली के आगमन से पहले ही लोग अपने घर के अंदर एवं बाहर के वातावरण को स्वच्छ बना देते हैं। नरक चतुर्दशी का तात्पर्य भी यही है कि उस दिन तक सब गंदगी दूर करके, लक्ष्मी जी के स्वागत के लिये तैयार हो जाए। भारतीय संस्कृति के अन्तर्गत मनाए जाने वाले सभी त्योहार एवं उत्सव महान् आदर्शों और उद्देश्यों से जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। दीपावली और विजयादशमी आपस में संबंधित पर्व हैं।
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भारतीय ऋषियों ने जिस प्रकार विजयादशमी को राज्य व्यवस्था और राष्ट्र रक्षा की व्यवस्था का निरीक्षण करने तथा उनकी त्रुटियां एवं कमियां दूर करने का अवसर माना है, उसी प्रकार दीपावली को राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था का दिग्दर्शन करने, उसकी प्रगति के लिए नवीन योजनाएं बनाने का उचित अवसर माना है।

कालांतर में जन साधारण ने कुछ बदलकर उस अर्थ को ग्रहण किया है कि दीपावली पर धन की देवी लक्ष्मी जी भ्रमण के लिए निकलती हैं और जिस स्थान को साफ-सुथरा एवं सुंदर देखती हैं, साल भर के लिये उसी को अपना आवास बना लेती हैं। वैसे मानस शास्त्र के इस विश्वास को निराधार नहीं माना जा सकता, क्योंकि शोभा और समृद्धि तथा गंदगी और दरिद्रता की आपस में सघन मैत्री है।

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सुशोभित एवं सुंदर स्थान की ओर ही सुख समृद्धि आकर्षित होती है। मैले और गंदे स्थान में दरिद्रता का निवास स्वाभाविक है। पुराणों में लक्ष्मी जी का आसन दिव्य कमल बतलाया गया है। उसका अर्थ भी यही है कि लक्ष्मी जी सुंदर स्थान में निवास करती है।


दीपावली हर वर्ष हम सबके लिये यह संदेश लेकर आती है कि राष्ट्र को समृद्धिशाली बनाने के लिये हम सब मिलकर दीनता, हीनता और दरिद्रता के कारणों को जड़ मूल से उखाड़ फेंकें। जब देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी तभी व्यापार और उद्योग-धंधों का विकास होगा और हम सुख वैभव का जीवन व्यतीत कर सकेंगे।

वैसे तो त्याग एवं कष्ट सहन करने का अध्यात्म में बहुत ऊँचा स्थान है, पर सभी लोगों के लिए तपस्वी जैसी जीवनचर्या अपना लेना संभव नहीं है। गृहस्थ जीवन में तो धन के बिना जीवन जीने की कल्पना करना भी निरर्थक है।

त्याग-तपस्या का यह अर्थ नहीं है कि संपत्ति या सुखदायक पदार्थों को हाथ भी न लगाया जाय, वरन् उसका आशय इतना ही है कि संपत्ति के झूठे मोह से अपने को बचाया जाय।

 ‘‘अपने लिए कठोरता और दूसरों के लिये उदारता’’ जिसकी मनोवृत्ति बन जाती है, ऐसे व्यक्ति राष्ट्र को उन्नति के शिखर पर चढ़ाने वाले होते हैं।

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