आनंद जो कभी समाप्त नहीं होगाः कृपालु जी महाराज
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मनुष्य का सबसे प्रमुख लक्ष्य है आनंद की प्राप्ति। इससे बड़ा कोई लक्ष्य नहीं है। अज्ञनता के कारण हम इस लक्ष्य को पाने में असफल रहते हैं अर्थात आनंद प्राप्त नहीं कर पाते हैं। ज्ञान के तीन प्रकार हैं ब्रह्म, जीव और माया। हमें बस यही ज्ञान प्राप्त करना है। ब्रह्म ही वास्तविक आनंद है। सत् चित इसका विशेषण है।
कहने का तात्पर्य यह है कि ब्रह्म ही ऐसा आनंद है जो नित्य है। सांसरिक आनंद जड़ है, अनित्य और इनकी सीमाएं हैं। सासंरिक आनंद एक समय पर समाप्त हो जाता है। मान लीजिए आपने रसगुल्ला खाया आपको बड़ा आनंद मिला। लेकिन कितनी देर के लिए, इस आनंद से बड़ा भी आनंद है। लेकिन ब्रह्म से बड़ा कोई आनंद नहीं है और इसका आनंद कभी समाप्त नहीं होता है।
रूपी ब्रह्म के दो रूप हैं। मूर्त और अमूर्त। वह जब चाहे निर्गुण निराकार बन जाता है और जब चाहे सगुण साकार बन जाता है।श्वेताश्वतर उपनिषद् के छठे अध्याय का आठवां मंत्र कहता है कि उसके पास अनंत अस्वभाविक शक्तियां है। इनमें सबसे प्रमुख है स्वरूप शक्ति। इस शक्ति के द्वारा वह दोनों रूप धारण कर लेता है अमूर्त और मूर्त।
अमूर्त रूप को मानने वाले शंकराचार्य ने भी मान है कि मूर्त और अमूर्त दो स्वरूप हैं ब्रह्म के। इसे इन्होंने व्यवहारिक रूप में भी दर्शाया है। चारों दिशाओं में चारों धाम की स्थापना करके उसमें ब्रह्म की मूर्ति स्थापित करके। जबकि भाष्य में लिखा शंकराचार्च ने लिखा है कि ब्रह्म का सगुण साकार रूप तो मायिक होता है। जीव भी मायिक और भगवान का सगुण साकार रूप वह भी मायिक यानी मायिक जीव मायिक ब्रह्म की पूजा करे।
मूर्त और अमूर्त रूप में ब्रह्म के तीन स्वरूप हैं जिसे ब्रह्म, परमात्मा और भगवान के नाम से जाना जाता है। वास्तव में ब्रह्म एक होते भी अनंत है। इसी प्रकार उनकी सभी चीजें अनंत हैं। उनकी लीलाएं, नाम, धाम सभी अनंत हैं।
साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)
कृपालु जी महाराज परिचय
कृपालु
जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर
प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ
था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में
व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में
कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों
में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की
एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।