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आनंद से संसार उत्पन्न होता है: कृपालु जी महाराज

Wed, 06 Mar 2013 11:50 AM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क। Updated Wed, 06 Mar 2013 11:50 AM IST
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kripalu ji maharaj pravachan definition of brahman and god

ब्रह्मा के आकार के विषय में भी हमारे मन में जिज्ञासा उठती है कि उसका आकार कितना बड़ा है। पहाड़ बड़ा होता है, पहाड़ से बड़ा समुद्र है, समुद्र से बड़ा आकश, ये भगवान कितना बड़ा है। वेदों और उपनिषदों में इसका उत्तर दिया गया है, जो अनंत है, जिसका अंत नहीं है, ऐसा है ब्रह्म। अगर ब्रह्म का आकार अनंत नहीं होगा तो प्रलय काल में सभी को अपने अंदर समाहित कैसे कर पाएगा।

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श्वेताश्वतर उपनिषद् एवं भागवत् कहता है, न उसके समान कोई है और न कोई उससे बड़ा है। वह दूसरे को बड़ा करता है उसके विषय में वेद कहता है उसके पास अनंत शक्तियां हैं जिनमें सबसे बड़ी है स्वरूप शक्ति, इसे ही पराशक्ति, योगमाया, चितशक्ति, अनंतरंगा शक्ति कहते है। इसके द्वारा वह जब जो चाहता है कर सकता है। उसके सोचने मात्र से सब संभव हो जाता है।
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ब्रह्म के स्वरूप के विषय में जब वरूण पुत्र भृगु ने वरूण से प्रश्न किया तब वरूण ने कहा कि ब्रह्मा को समझना बहुत ही कठिन है। ब्रह्म को आसानी से समझा नहीं जा सकता है, इसके लिए साधना करो, वियोग में जलो और अंतःकरण को शुद्घ करो। पिता से आज्ञा लेकर भृगु तपस्या करने चले गये। काफी समय बाद जब लौटे तब वरूण देव ने पूछा कि ब्रह्म का रहस्य समझ गये। भृगु ने उत्तर दिया जी, ब्रह्म अन्न है। वरूण ने कहा अभी नहीं समझे हो अभी और तपस्या करो।
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भृगु फिर तपस्या करने चले गये। इस बार जब लौटकर आये तो कहा कि ब्रह्म प्राण है। वरूण ने फिर कहा कि ब्रह्म का अर्थ अभी नहीं समझे हो। इसी प्रकार भृगु तपस्या करके लौटते और अपना उत्तर देते लेकिन, वरूण उन्हें गलत कह देते हैं। यह क्रम कई बार चला, जब भृगु ने कहा कि ब्रह्मा आनंद है। इस उत्तर को सुनकर वरूण ने कहा कि अब तुम ब्रह्म को समझ गये हो। तैतरीय उपनिषद् में इस कथा का उल्लेख किया गया है।

भृगु के उत्तर से संतुष्ट होकर वरूण ने समझाया कि आनंद ही संसार की उत्पति का कारण है इसी से संसार पैदा होता है। संसार आनंद से पालित और रक्षित है। अंत समय में आनंद में ही संसार का लय हो जाता है। संसार में हर तरफ आनंद है फिर हम कोटि जन्म लेते रहते हैं लेकिन जिस आनंद को पाना चाहते हैं उसे प्राप्त नहीं कर पाते हैं और भटकते रहते हैं।   

आनंद स्वरूप ब्रह्म हर रूप में हमारे साथ-साथ चलता है यानी हम जिस योनी में जन्म लेते हैं उसमें वह हमारे साथ रहता है। ब्रह्म इस इंतजार में रहता है कि हम कब माया की ओर बढ़ते कदम को रोककर ब्रह्म को पाने की दिशा में चलेंगे।

साभारः कृपालु जी महाराज (ब्रह्म, जीव, माया)

कृपालु जी महाराज परिचय
कृपालु जी महाराज का जन्म सन् 1922 ई. में शरद्पूर्णिमा की रात्रि में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के मनगढ़ ग्राम में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा के पश्चात इन्होंने इंदौर, चित्रकूट एवं वाराणसी में व्याकरण, साहित्य तथा आयुर्वेद का अध्ययन किया। 16 वर्ष की अल्पायु में कृपालु जी ने चित्रकूट के शरभंग आश्रम एवं वृंदावन के वंशीवट के निकट वनों में वास किया। 14 जनवरी 1957 को कृपालु जी महाराज को काशी में विद्वानों की एक सभा ने जगद्गुरू की उपाधि से सम्मानित किया।


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