बुद्घि जरूरी है लेकिन अधिक बुद्घि नुकसान का कारण बन सकता है

टीम डिजिटल Updated Tue, 26 Nov 2013 12:37 PM IST
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संसार में धन दौलत से भी जिस चीज को अधिक महत्व दिया गया है वह है बुद्घि। लेकिन कहते हैं अगर बुद्घि जरूरत से अधिक हो जाए तो यह भी नुकसान कर जाती है। क्योंकि जितनी बुद्घि होगी उतना ही अधिक तर्क लगाएंगे परिणाम तर्क कुतर्क बन जाएगा। कुतर्क से हमेशा हानि होती है।
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धर्मग्रंथों का उदाहरण लीजिए जो आपको एक भी अतिबुद्घिमान व्यक्ति नहीं मिलेंगे जिन्होंने ईश्वर की कृपा प्राप्त की हो यानी जिन्हें ईश्वर ने दर्शन दिए हों। दर्शन देंगे भी तो कैसे? वह पत्थर में भगवान के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेगा।
दर्शन उसी को मिलते हैं जो कुतर्क नहीं करता। स्थिर मन से पत्थर में भगवान की छवि देखता है, आस्था की शक्ति से पत्थर को भगवान का रूप लेकर भक्त को दर्शन देना पड़ता है। इसी प्रकार छात्रों को भी गुरू की बातों को याद रखकर उसका चिंतन मनन करना चाहिए। जब छात्र अपनी बुद्घि से अधिक तर्क करने लगता है तो नुकसान उठाना पड़ता है। इसका एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत कथा में है।
एक गुरु अपने शिष्य के साथ रेगिस्तान से गुजर रहे थे। गुरु इस यात्रा में हर क्षण शिष्य में आस्था जागृत करने के लिए ज्ञान दे रहे थे। चलते-चलते गुरु ने कहा, ‘अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को अर्पित कर दो। हम सभी ईश्वर की संतान हैं और वह अपने बच्चों को कभी नहीं त्यागते। उसे मझधार में कभी भी अकेला नहीं छोड़ते। अगर तुम उन पर विश्वास करोगे, तो तुम्हारी नैया आसानी से पार लगा देंगे।’ शिष्य चुपचाप सुनता जा रहा था।

रात में उन दोनों ने रेगिस्तान में एक स्थान पर अपना डेरा जमाया। गुरु ने शिष्य से कहा कि वह घोड़े को निकट ही एक चट्टान से बांध दे। शिष्य घोड़े को लेकर चट्टान तक गया। उसे दिन में गुरु द्वारा दिया गया कोई उपदेश याद आ गया। उसने सोचा, ‘गुरु संभवतः मेरी परीक्षा ले रहे हैं। आस्था कहती है कि ईश्वर इस घोड़े का ध्यान रखेंगे।’ और उसने घोड़े को चट्टान से नहीं बांधा।

सुबह उसने देखा कि घोड़ा दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आ रहा है। उसने गुरु से जाकर कहा, ‘आपको ईश्वर के बारे में कुछ नहीं पता! कल ही आपने बताया था कि हमें सब कुछ ईश्वर के हाथों में सौंप देना चाहिए, इसीलिए मैंने घोड़े की रक्षा का भार ईश्वर पर डाल दिया, लेकिन घोड़ा भाग गया!’

यह सुनकर गुरु ने कहा, ‘ईश्वर तो वाकई चाहता था कि घोड़ा हमारे पास सुरक्षित रहे, लेकिन जिस समय उसने तुम्हारे हाथों घोड़े को बांधना चाहा, तब तुमने अपने हाथ ईश्वर को नहीं सौंपे और घोड़े को खुला छोड़ दिया।’ गुरु के यह कहते ही शिष्य को अपनी गलती का एहसास हो गया।
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