किसी से इतनी अपेक्षाएं न करें कि उनके पूरा न होने पर खुद को दुख पहुंचे
किशन भाई की कहानी, जिन्होंने बताया कि बच्चों पर उम्मीदें लादने के बजाय उन्हें अनुभव हासिल करने देना चाहिए।
किशन भाई एक मनोवैज्ञानिक थे। वह रोज सुबह अपने बेटे को छोड़ने स्कूल जाते थे। लिहाजा बच्चों को स्कूल छोड़ने आने वाले अन्य माता-पिताओं से उनकी भेंट हो जाती थी। सारे माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल में छोड़ एक खोखे पर जाकर चाय पिया करते थे। उस दिन रीना मैडम काफी परेशान दिख रही थीं। किशन भाई ने पूछा, क्या बात है, आप काफी चिंतित दिख रही हैं? वह बोलीं, किशन भाई, मैं अपने बेटे से बहुत परेशान हूं।
आजकल वह मेरी एक नहीं सुनता। मेरा तिरस्कार करता है। किशन भाई मुस्कराते हुए कहने लगे, इसमें कौन-सी नई बात है। पूछ लीजिए यहां खड़े सभी अभिभावकों से। कोई अपने बच्चे से खुश नहीं होगा। रीना जी ने पूछा, लेकिन इसका उपाय क्या है? किशन भाई बोले, तिरस्कार, अपमान और अनादर की भावना हमारे बच्चे में नहीं, हमारे खुद के अंदर है। पहले इसे निकाल दीजिए। रीना मैडम ने कहा, पर कैसे? किशन भाई बोले, अगर आपको कोई किसी कमरे में बंद कर दे, तो कैसा लगेगा? रीना मैडम बोलीं, मैं वह कमरा तोड़कर भागना चाहूंगी।
किशन भाई बोले, बंद कमरे में कैद रहना कोई नहीं चाहेगा। लेकिन हम अनजाने में अपने बच्चों के साथ अक्सर यही करते हैं। उन्हें अपनी अपेक्षाओं के बंधन में बांध देते हैं। और अगर कहीं उन्होंने हमारी अपेक्षाएं पूरी नहीं कीं, तो हमें लगता है, जैसे वह हमारा अनादर कर रहा है।
रीना जी बोलीं, पर हम तो बच्चों का भला ही चाहते हैं। किशन भाई बोले, बिल्कुल। लेकिन हमें यह भी अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि उनका भला चाहते हुए उन्हें उनके अपने अनुभवों से वंचित न रखें। उनके हिस्से के गलत-सही अनुभव उनको करने दें, क्योंकि वे अनुभव ही उनके लिए असल सीख होंगे। और अगर हम उन्हें ऐसा करने देंगे, तो हमारे अंदर भी कोई ऐसा भाव रह नहीं जाएगा कि वह हमारी बात सुन नहीं रहे, क्योंकि हमें उनसे कोई अपेक्षा रह ही नहीं जाएगी।