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इसलिए आपको सोना या तांबे की अंगूठी धारण करना चाहिए
सद्गुरु जग्गी वासुदेव
Updated Sun, 16 Aug 2015 03:54 PM IST
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भारतीय धर्म पंरपरा में कोई कारोबार नहीं होता, कोई शादी नहीं होती, कोई बच्चा नहीं होता, कोई परिवार नहीं होता। जो कुछ होता है, बस आपकी मुक्ति का एक साधन है। आप शादी करते हैं, आप बच्चों को बड़ा करते हैं या आप संन्यासी बनते हैं क्योंकि आप उसे अपनी मुक्ति के लिए एक साधन के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं।
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इसलिए ,किसी शादी में इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि आपके पति और पत्नी पहले क्या करते थे। आप वर्तमान में जैसे हैं, वह एक विस्फोटक अनुभव होता है। यह सिर्फ दो शरीरों, मन या भावनाओं का मिलन नहीं था, दो जीवन एक हो जाते थे।
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महिलाओं को शादी के बाद बिछिया, नाक की लौंग और दूसरे आभूषण पहनने के लिए कहा जाता था, क्योंकि शादी एक ऐसा बड़ा अनुभव होता था कि वे शरीर को छोड़ सकती थी। अगर आपके शरीर के कुछ खास अंगों पर धातु हो, तो आप अचानक से अपना शरीर नहीं छोड़ सकतीं।
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यहां भी, हम जब लोगों को गहन साधना के मार्ग पर डालते हैं, तो हम उन्हें तांबे की अंगूठी देते हैं। हम उन्हें यह नहीं बताते थे कि यह किस लिए है, मगर वे मेरी अनुमति के बिना उसे हटा नहीं सकते थे। मुख्य रूप से आध्यात्मिक साधना का मकसद जीवन के सुर को सर्वोच्च बिंदु तक ले जाना होता है।
अब आध्यात्मिक साधना से आप उसे तेज करना चाहते हैं। जब आप एक खास बिंदु तक उसे बढ़ाते हैं, जब लोग बहुत तीव्र साधना करते हैं, तो इस बात की संभावना होती है कि वे अचानक शरीर से मुक्त हो सकें। लेकिन शरीर पर धातु हो, तो ऐसी कोई चीज नहीं होती। धातु हमेशा उस प्रक्रिया को बाधित कर देती है क्योंकि वह शरीर के साथ आपका संपर्क मजबूत करता है। खासकर तांबा। कुछ हद तक सोना भी ऐसा करता है।