यूं ही नहीं उपवास करते हैं, इसके पीछे बड़ा आध्यात्मिक कारण है
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योग में उपवास के जितने अर्थ दिए गए हैं, उनमें एक अपने आप के साथ रहना भी है। याज्ञवल्क्य के अनुसार अपने भीतर यज्ञीय अग्नि का आह्वान और स्थापना उपवास है। निराहार रहना इस अनुष्ठान का शुरुआती आधार है। सामान्य और सहज जीवन क्रम में तो संतुलित और सम्यक जीवनचर्या अपनाने को ही श्रेष्ठ कहा गया है। जैसे कि श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है कि यह योग न तो अतिशय खाने वाला का और न ही बिलकुल भी नहीं खाने वाले के लिए है।
शरीर के लिए जितना जरूरी हो उतना ही आहार, शयन, जागरण और कर्म करना चाहिए। लेकिन जब अपने भीतर विशेष बल की जरूरत हो तो मरणान्तक उपवास- कार्य सिद्ध नहीं होने तक कुछ भी नहीं खाने पीने के व्रत भी बताए गए हैं। भागवत ने इस तरह के संकल्प को प्रयोपवेश कहा है। परीक्षित ने जीवन का अंत करीब आया जान कर विष्णु का ध्यान धर कर प्रायोपवेश व्रत लिया था। वह परीक्षित के व्रत की सराहना करते हुए उनके अनुष्ठान को देखने आए थे।
रामायण में उपवास की महिमा
रामायण में जीवन का लौकिक उद्देश्य पूरा हो जाने के अंतिम सत्य तक पहुँचने के लिए लक्ष्मण का सरयू किनारे लंबा उपवास और लंका विजय के समय राम समुद्र में मार्ग पाने के लिए अनशन भी आत्म या दिव्य शक्ति की आह्वान के कुशह प्रसिद्ध प्रसंग है।
पुराणों से बाहर अलग देखें तो महावीर स्वामी के जरिए बारह वर्ष के कठोर तप और उपवास के बाद कर्मो की निर्जरा और गौतम बुद्ध द्वारा छः वर्ष के तप उपवास के बाद संबोधि प्राप्त होने की घटनाएं तो ऐतिहासिक ही कही जाती है।
वैदिक काल में कोई भी धार्मिक कृत्य, उपवास के साथ शुरू किया जाता था। बड़े योग्य और संगीतियों ने पहले जिस कर्म को बताया गया है वह आत्मशुद्धि के लिए किया गया उपवास ही है। जीवन को अध्यात्मिक भाव से देखने वाली आर्ष दृष्टि के लिए शरीर नहीं उसका आत्म तत्व प्रमुख है।
उस आत्मतत्व के लिए जिन क्षणों में इनका परिहार जरूरी लगता है, उन क्षणों में उपवास, अनशन, प्रायोपवेश और संथारा जैसे प्रयोग किए जाने चाहिए। डा गोपीनाथ कविराज के अनुसार जिस काल या समूह में एकमात्र श्री ही जीवन का साधन नहीं था, उस दौर में उपवास और अनशन जीवन से ज्यादा ऊर्जा जागते थे।
व्रत करने से होते हैं यह फायदे
कुमारिल भट्ट का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा है कि आचार्य ने प्रायश्चित की एक मर्यादा का निर्वाह करने के लिए ही अपने आपको जीवित ही जलती हुई भूसे की आग में झोंक दिया। बारह सौ साल पहले हुए वेदांत के इस उद्भट विद्वान को इतना कठिन प्रायश्चित नहीं करने का परामर्श देते हुए आदि शंकर भी आए थे पर कुमारिल ने कहा कि शरीर तो क्षणभंगुर है, उसके लिए धर्म मर्यादा क्यों तोड़ी जाए?
उपवास से आत्मशक्ति या विनम्र भाव से कहे तो ईश्वरीय अनुगृह पाने की रीति व्रत उपवास के रूप में बेहद लोकप्रिय है, व्रत धर्म का साधन माना गया है। संसार के समस्त धर्मों ने किसी न किसी रूप में व्रत और उपवास को अपनाया है।
व्रत-उपवास के बारे में आम मान्यता है इन से पापों का नाश, पुण्य का उदय, शरीर और मन की शुद्धि, शांति और कामनाओं की सिद्धि होती है। व्रत उपवास में निराहार या अल्पाहार पर जोर रहता है। उस दौरान मद्य, मांस आदि लेना और सुबह या शाम के समय सोना वर्जित है। सत्य और मधुर भाषण तथा संपर्क में आने वालों के प्रति सद्भाव रखना रखना आवश्यक है।
तिथियों और पर्वों के अनुसार व्रत उपवास के अलग अलग विधान है। लेकिन अनुशासन सबका लगभग सामान है। संक्षेप में यह कि उपवास या व्रत के समय अनुशासित रहा जाए। निर्धारित नियमों का कड़ाई से पालन हो। कोशिश रहे कि उस समय जो नियम अपनाए जाएं, वे दिन प्रतिदिन के व्यवहार का हिस्सा भी बनें। अनशन उपवास के जो उत्कट प्रतिमान हैं- रामायण महाभारत और महावीर और बुद्ध के, उन तक पहुंचना शायद बेहद कठिन हो। लेकिन शुचिता और शक्ति के लिए न्यूनतम अनुशासन मानने की अपेक्षा तो की ही जाती है।