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बना रहेगा पूरे साल आपसी प्यार, होली पर करें यह काम
डॉ. प्रणव पण्ड्या/शांतिकुंज, हरिद्वार
Updated Wed, 04 Mar 2015 05:07 PM IST
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आजकल माघ की पंचमी से ही वसंत का आगमन मान लिया जाता है। माघ के शुक्ल पक्ष की पंचमी को जिसे वसंत पंचमी भी कहते हैं, रात को ही होली का प्रतीक एक काष्ठ प्रत्येक गाँव-मुहल्ले या टीले में गाड़ दिया जाता है। उसी दिन से काष्ठ-संचय आरंभ हो जाता है और वसंत राग चौताल आदि गाए जाने लगते हैं। पर शास्त्रों में फाल्गुन शुक्ल पंचमी से पूर्णिमा तक दस तिथियों में लकड़ी संचय करने का विधान है।
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खैर, नियम विधान चाहे जो हो, उत्सव का स्वरूप सही होना चाहिए, शान्तिपूर्ण होना चाहिए, प्रेरक होना चाहिए, सबसे लिए सुखकर होना चाहिए, उससे समाज के लिए सन्देश निकलना चाहिए और जीवन के लिए खुशी और आनन्द मिलना चहिए। होली अन्याय पर न्याय की, असत्य पर सत्य की, अधर्म पर धर्म की विजय का त्योहार है, यह इसी रूप से रहे तो ही सार्थक है।
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गायत्री परिवार की प्रमुख भगवती देवी का कहना था कि आपस में प्यार बांटो, सुख-दुख में साथी बनकर रहो और सदैव मुस्कराते रहो। इसका क्या तात्पर्य है? तात्पर्य यह है कि प्यार बांटने से प्यार मिलता है। सहयोग करने से सहयोग मिलता है। सम्मान देने से सम्मान मिलता है। यानि देने से मिलता, अतः केवल पाने का ही भाव नहीं रखने चाहिए, दिल में देने का भाव भी होना चाहिए।
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जब सब आपसे देने, सहायता करने, मिलजुलकर रहने और प्यार बांटने में लग जाएं तो फिर तो मुस्कराना ही मुस्कराना है। इसीलिए वे कहती थीं-मुस्कराते रहो। होली के रंगोत्सव की भी यही प्रेरणा है-प्यार से गले मिलो। कल्पना करें यह प्यार यदि सदा सदा के लिए रह जाए तो फिर धरती में दुःख अभाव कहां रहेगा?