इस तरह टूटा धनवान होने का अभिमान, शर्म से झुका सिर
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गुजरात की राजमाता मीणलदेवी बड़ी उदार थीं। वह सोमनाथ के दर्शन करने गई। अपने साथ वह पर्याप्त मात्रा में सोने-चांदी की मुद्राएं ले गई थी। साधु-संतों और सामान्य जनों को उन्होंने यथेष्ट दान दिया। मां की यात्रा के पुण्य-प्रसंग में राजा सिद्धराज ने लोगों के लाखों रुपये का लगान माफ कर दिए। इससे मीणल के मन में अभिमान आ गया कि मेरे समान दान करने वाली दूसरा कोई नहीं। इस अभिमान में फूली न समाती हुई वह सो गई। उस रात उन्होंने सपना देखा। सपने में जैसे भगवान सोमनाथ कह रहे थे, मंदिर में एक गरीब स्त्री यात्रा करने आई है, तू उसका पुण्य मांग।
मीणल ने सोचा, इसमें कौन-सी बड़ी बात है? रुपये देकर पुण्य ले लूंगी। राजमाता ने उस गरीब स्त्री की खोज कराई। उनके सेवक यात्रा में आई एक अकिंचन वृद्ध स्त्री को ले आए। राजमाता ने उससे कहा-अपना पुण्य मुझे दे सकती हो? बदले में जितना चाहे धन ले लो। उसने मना कर दिया। मीणल को इस तरह मना करना अच्छा नहीं लगा। तब राजमाता ने कहा-तूने ऐसा क्या पुण्य किया है, बता तो सही।
उस स्त्री ने कहा, कुछ नहीं। मैं घर से निकलकर कई गांवों में भीख मांगती हुई यहां पहुंची हूं। कल तीर्थ का उपवास था। किसी पुण्यात्मा ने आज मुझे बिना नमक का सत्तू दिया। मै उसे खाने लगी, तो एक वृद्ध सज्जन ने कुछ हिस्सा देने के लिए कहा। मैंने पहले उस साधु को समर्पित किया और बचे हुए से अपने उपवास का पारण। मेरा तो पुण्य ही क्या है? पुण्य तो आपका और परिवार के लोगों का है। आप राज परिवार के हैं। आपने प्रजा का लगान माफ करवा दिया। सोने की मोहरों से शंकर की पूजा की। आप मेरा पुण्य क्यों मांग रही हैं, जो कुछ है ही नहीं?
मीणल की नींद टूट गई। शिवालय में कोई गा रहा था। राजमाता को लगा कि गीत उसी के लिए था। तभी उन्होंने संकल्प लिया कि संपत्ति कितनी भी हो, उसका गुमान नहीं करना चाहिए।