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जिंदगी की राह में भटक गए हैं तो राह दिखाएंगे भटके हुए देवता

Sun, 17 Jan 2016 03:39 PM IST
Updated Sun, 17 Jan 2016 03:39 PM IST
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haridwar gyatri tirth bhatke devta temple

कभी सुना है भटके हुए देवताओं के मंदिर भी हो सकते हैं? जी हाँ; सही सुना आप ने। हरिद्वार में है भटके हुए देवता के मंदिर। मनुष्य भटका हुआ देवता और उठा हुआ पशु है। मनुष्य योनि श्रेष्ठ योनि है। उसे बुद्धि से सोचने की अद्भुत क्षमता मिली हुई है। मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि कहलाता और प्रकृति का अधिष्ठाता होने का दम भरता है, तो भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि अन्य प्राणियों को सृष्टा ने कोई विशेषताएं नहीं दी हैं। वे अनेक प्रसंगों में विशेषतया अतीन्द्रिय क्षमताओं के संबंध में मनुष्य से कहीं आगे हैं।

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इन बातों को ध्यान मे रखकर गायत्री परिवार के संस्थापक पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने शांतिकुंज आश्रम में गायत्री माता के विशाल मंदिर परिसर मे यह मंदिर बनवाये हैं। यहाँ आने वाले साधक इस मंदिर में ध्यान करते हैं। अब इस मंदिर के अंदर मूर्ति की बात करें तो आप सुनकर हैरान हो जायेंगे। क्योंकि यहां सिर्फ और सिर्फ 5 बड़े बड़े आइने (कांच) लगे हैं और उनमें आत्मबोध, तत्वबोध कराने वाले वेद-उपनिषदों के मंत्र लिखे हैं।

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इस मंद‌िर की और भी खूब‌ियां

haridwar gyatri tirth bhatke devta temple

चारों वेदों के चार महावाक्य जो जीव-ब्रह्म की एकता को बताते है, यहां उल्लिखित हैं। साधक यहाँ आकर सोऽहं से अहम् या आत्मब्रह्म तक के सूत्रों को धारण करते हैं। कहते हैं यहाँ आकर साधकों में आत्मबोध की अनुभूति होती है। यहाँ 9 दिन के सत्रों व एक मासिक प्रशिक्षण शिविरों में आने वाले प्रत्येक साधक इस बीच आचार्य जी द्वारा लिखित पुस्तक 'मै कौन हूँ?’

में निर्दिष्ट साधना प्रणाली का अभ्यास करता है। भटका हुआ देवता के मन्दिर में संक्षेप में उसी साधना विधान का निर्देश है। जहाँ पत्थर की प्रतिमाओं पर धूप-दीप गन्ध-पुष्प चढ़ाकर भक्ति भावना निविदेत किया जाता है, वहाँ दर्पण के सामने खड़े होकर अपने आपके स्वरूप को निहार कर अन्तःकरण की गहराई में झाँकने का अभ्यास भी सतत करते रहना चाहिए। इससे मनुष्य रूपी भटका हुआ देवताओं को देर सबेर अपने देव स्वरूप, ब्रह्म स्वरूप ‘अहं ब्रह्माऽस्मि’ की अनुभूति होती है।

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