जानिए, नवरात्र में गायत्री आराधना का महत्व
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय पर्वों और त्यौहारों में नवरात्रि पर्व का अपना अलग महत्त्व है। यह वर्ष में दो बार आता है। दुर्गावतरण की पावन कथा भी इसके साथ जुड़ी हुई है। देवत्व के संयोग से असुर निकंदिनी महाशक्ति के उद्भव का महत्त्व हर युग में रहा है। युग की भयावह समस्याओं से मुक्ति पाने के लिए युग शक्ति के प्रकट होने की कामना हर किसी के मन में उठती है।
अधिकांश लोग व्रत, उपवास एवं अनुष्ठान करते हैं। प्रतीक्षा रहती है कि कब नवरात्र आये और हम साधना, अनुष्ठान के माध्यम से मनोवांछित फल प्राप्त कर सकें।
नवरात्र के नौ दिन गायत्री साधना के लिए भी अधिक उपयुक्त है। इन नौ दिनों में उपवास रखकर 24 हजार मंत्रों के जप का छोटा सा अनुष्ठान बड़ी साधना के समान परम हितकर सिद्ध होता है। कष्ट निवारण, कामना पूर्ति एवं आत्म बल बढ़ाने के साथ ही साथ यह साधना सद्विवेक अर्थात् प्रज्ञा का जागरण करती है।
गायत्री कामधेनु है। जो नवरात्रि में उसकी पूजा-उपासना, आराधना करता है, माता प्रत्यक्ष उसे अमृतोपम दुग्धपान कराती रहती है। अज्ञान को दूर करके ज्ञान का प्रकाश प्रदान करती है।
गायत्री की शक्ति दुर्गा
नवरात्र के पावन पर्व पर प्राचीन काल में एकमात्र गायत्री उपासना का प्रसंग मिलता है। विभिन्नताएं तो सामयिक देन हैं। इस पावन पर्व के साथ उच्च स्तरीय प्रेरणाएं भी जुड़ी हैं।
गायत्री की शक्ति दुर्गा का अवतरण समस्त देशवासियों का सम्मिलित स्वरूप था। असुरों से संत्रस्त देवता ब्रह्मा के पास जाकर निवेदन करते हैं कि हम सद्गुण संपन्न होने पर भी असुरों से क्यों हारते हैं?
ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया कि संगठन और पराक्रम के अभाव में अन्य गुण निष्प्राण बने रहते हैं। पराक्रमी और संगठित हुए बिना संकटों से छुटकारा एवं वर्चस्व प्राप्त नहीं कर सकते। देवता सहमत हुए संगठित पराक्रम से ही दुर्गावतरण संभव हो सका। आज भी वही स्थिति है।
देवत्व को हारते और दैत्य को जीतते कदम-कदम पर देखा जाता है। उसमें दैत्य की वरिष्ठता कारण नहीं, वरन यह है कि देव पक्ष ने संगठित होने की आवश्यकता ही नहीं समझी और न तो कोई शौर्य-पराक्रम ही दिखाया।
शक्ति के जागरण का पर्व
इसी भोलेपन को दुर्जनों ने उनकी दुर्बलता समझ लिया और निर्द्वन्द्व होकर अनाचार करना प्रारंभ कर दिया। संक्षेप में आज की बढ़ती हुई अपराध वृत्ति के मूल में यही एक कारण है। इसीलिए इसे समूह शक्ति के जागरण का पर्व भी कह सकते हैं।
नवरात्रि उपासना से यदि सज्जनता का अर्थात् देवत्व का संगठन खड़ा हो सके, तो समझना चाहिए कि हमारी साधना सार्थक हुई। सामूहिकता की शक्ति से सभी परिचित हैं।
बिखरे हुए धर्मप्रेमियों को एक झण्डे के नीचे इकट्ठे और संगठित करने का प्रयास नवरात्रि की सामूहिक साधना के माध्यम से ली प्रकार सम्पन्न किया जा सकता है।
www.awgp.org