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काम व्यवहार करने के बाद भी ब्रह्मचारी कैसे रह सकते हैं
गुरु मां आनंदमूर्ति/अध्यात्मिक गुरु
Updated Fri, 21 Feb 2014 12:25 PM IST
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ब्रह्मचर्य का शाब्दिक अर्थ है जब ब्रह्म में रमण होता है। यानि चेतना को उच्चतर क्षेत्र में ले जाने के लिए कृतसंकल्प होना। देह में ओज को, उर्जा को सुरक्षित रखना। स्त्री-पुरुष के शारीरिक व्यवहार न करने भर को ब्रह्मचर्य नहीं कहते।
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तंत्र विज्ञान में शिव ने उमा से कहा है कि जिसके भीतर अस्तेय, ज्ञान और आत्मनिष्ठा है, वह हर स्थिति में ब्रह्मचारी है। श्रीराम ने वशिष्ठजी से पूछा गुरुदेव! एक तरफ आप कहते हैं कि महादेव योगी हैं और दूसरी और यह भी कहते हैं कि वह अपनी पत्नी उमा के साथ काम-व्यवहार कर रहे थे।
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वशिष्ठ जी ने कहा राम! जिसका निश्चय ब्रह्म में है, ऐसे व्यक्ति को शरीर का कोई भी व्यवहार किंचित मात्र भी लिपायमान नहीं करता। कोई गृहस्थ जीवन को जी रहा हो, तो भी ब्रह्मचारी है। ब्रह्मचर्य का अर्थ-बिन्दु की रक्षा करना।
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बिन्दु का अर्थ वीर्य नहीं है। बिन्दु का अर्थ है-ऐसा अमृत जो तुम्हारे बिन्दु विसर्ग से निकलता है। उस अमृत की सुरक्षा करना ही ब्रह्मचर्य है। योग कहता है कि जिसने अपने बिन्दु की रक्षा की वही ब्रह्मचारी है। बिन्दु विसर्ग क्या है? आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य में एक और चक्र है, जिसे कहते हैं-बिन्दु विसर्ग।
श्रीकृष्ण को एक बार गोपियों ने कहा कि दुर्वासाजी को भोजन करना चाहते हैं पर यमुना में बाढ़ आई हुई है। हम कैसे जाएं? श्रीकृष्ण ने कहा कि जाकर यमुना से प्रार्थना करके कहो कि हे यमुना! अगर श्रीकृष्ण ब्रह्मचारी है तो हमें मार्ग दे दो।
यह सुनकर गोपियां हंसने लगी कि तू और ब्रह्मचारी? राधासहित हम सब गोपियों के संग तेरा संजोग है, उसके बाद तू कहता है कि मैं ब्रह्मचारी? श्रीकृष्ण ने कहा कि जो मैंने कहा वह करो! गोपियों ने जाकर यमुना को वैसा ही कह दिया और यमुना ने रास्ता दे दिया।
जब वापिस लौटीं तो सबने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे कृष्ण! यह तेरी माया समझ नहीं आई? तू जानता है और हम भी जानते हैं कि हमारा तुमसे श्रृंगार-रस का संबंध है। उसके बाद भी यमुना ने मार्ग कैसे दे दिया? श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि तुम लोगों की भावना और प्रेम को स्वीकार करते हुए मेरा तुम लोगों से संजोग जरुर हुआ, परन्तु मेरे बिन्दु की रक्षा हमेशा रही है।