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भगवान का सबसे प्रिय आहार अहंकार
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Mon, 24 Dec 2012 11:42 AM IST
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अहंकार शब्द बना है अहं से, जिसका अर्थ है 'मैं'। जब व्यक्ति में यह भावना आ जाती है कि 'जो हूं सो मैं, मुझसे बड़ा कोई दूसरा नहीं है' तभी व्यक्ति का पतन शुरू हो जाता है। द्वापर युग में सहस्रबाहु नाम का राजा हुआ। इसे बल का इतना अभिमान हो गया कि शिव से ही युद्घ करने पहुंच गया। भगवान शिव ने सहस्रबाहु से कह दिया कि तुम्हारा पतन नजदीक आ गया है। परिणाम यह हुआ कि भगवान श्री कृष्ण से एक युद्घ में सहस्रबाहु को पराजित होना पड़ा।
रावण विद्वान होने के साथ ही महापराक्रमी था। उसे अपने बल और मायावी विद्या का अहंकार हो गया और उसने सीता का हरण कर लिया। इसका फल रावण को यह मिला कि रावण का वंश सहित सर्वनाश हो गया। अंत काल में उसका सिर भगवान राम के चरणों में पड़ा था। भगवान कहते हैं 'मेरा सबसे प्रिय आहार अहंकार है' अर्थात अहंकारियों का सिर नीचा करना भगवान को सबसे अधिक पसंद है।
अहंकारी का सिर किस प्रकार भगवान नीच करते हैं इस संदर्भ में एक कथा है कि, नदी किनारे एक सुन्दर सा फूल खिला। इसने नदी के एक पत्थर को देखकर उसकी हंसी उड़ायी कि, तुम किस प्रकार से नदी में पड़े रहते हो। नदी की धारा तुम्हें दिन रात ठोकर मारती रहती है। मुझे देखो मैं कितना सुन्दर हूं। हवाओं में झूमता रहता हूं। पत्थर फूल की बात को चुपचाप सुनता रहा।
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पानी में घिसकर पत्थर ने शालिग्राम का रूप ले लिया था। किसी व्यक्ति ने उसे उठाकर अपने पूजा घर में स्थापित किया और उसकी पूजा की। पूजा के समय उस व्यक्ति ने फूल को शालिग्राम के चरणों में रख दिया। फूल ने जब खुद को पत्थर के चरणों में पाया तो उसे एहसास हो गया कि उसे अपने अहंकार की सजा मिली है। पत्थर ने अब भी कुछ नहीं कहा वह फूल की मनःस्थिति को देखकर मुस्कुराता रहा।
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रावण विद्वान होने के साथ ही महापराक्रमी था। उसे अपने बल और मायावी विद्या का अहंकार हो गया और उसने सीता का हरण कर लिया। इसका फल रावण को यह मिला कि रावण का वंश सहित सर्वनाश हो गया। अंत काल में उसका सिर भगवान राम के चरणों में पड़ा था। भगवान कहते हैं 'मेरा सबसे प्रिय आहार अहंकार है' अर्थात अहंकारियों का सिर नीचा करना भगवान को सबसे अधिक पसंद है।
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अहंकारी का सिर किस प्रकार भगवान नीच करते हैं इस संदर्भ में एक कथा है कि, नदी किनारे एक सुन्दर सा फूल खिला। इसने नदी के एक पत्थर को देखकर उसकी हंसी उड़ायी कि, तुम किस प्रकार से नदी में पड़े रहते हो। नदी की धारा तुम्हें दिन रात ठोकर मारती रहती है। मुझे देखो मैं कितना सुन्दर हूं। हवाओं में झूमता रहता हूं। पत्थर फूल की बात को चुपचाप सुनता रहा।
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पानी में घिसकर पत्थर ने शालिग्राम का रूप ले लिया था। किसी व्यक्ति ने उसे उठाकर अपने पूजा घर में स्थापित किया और उसकी पूजा की। पूजा के समय उस व्यक्ति ने फूल को शालिग्राम के चरणों में रख दिया। फूल ने जब खुद को पत्थर के चरणों में पाया तो उसे एहसास हो गया कि उसे अपने अहंकार की सजा मिली है। पत्थर ने अब भी कुछ नहीं कहा वह फूल की मनःस्थिति को देखकर मुस्कुराता रहा।