{"_id":"b326faea-773f-11e2-8deb-d4ae52bc57c2","slug":"give-your-children-worlds-precious-wealth","type":"story","status":"publish","title_hn":"अपने बच्चों को दें संसार का सबसे बड़ा धन ","category":{"title":"Wellness","title_hn":"पॉज़िटिव लाइफ़","slug":"wellness"}}
अपने बच्चों को दें संसार का सबसे बड़ा धन
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Fri, 15 Feb 2013 12:47 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हर माता-पिता की इच्छा रहती है
विज्ञापन
कि वह अपने जीवन में काफी धन इकट्ठा कर लें ताकि अपने बच्चों को धन संपत्ति देकर
दुनिया से विदा हों। इसके लिए माता-पिता अपनी ओर से काफी प्रयास भी करते हैं। बैंक
बेलैंस करते हैं, घर और जमीन खरीदते हैं। लेकिन यह सारी संपत्ति उस एक धन के आगे
कंकड़ के समान है जिसे ज्ञान कहते हैं।
नीतिशास्त्र में कहा गया है कि 'माता शत्रुः पिता वैरी, येन बालो न पाठितः' अर्थात वह माता पिता बच्चों के शत्रु हैं जो अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की उचित व्यवस्था नहीं करते हैं। भौतिक संपत्ति अर्जित कर देने मात्र से माता-पिता बच्चों के शुभचिंतक नहीं होते। शास्त्रों में ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि बच्चों के लिए भले ही ढ़ेरों संपत्ति अर्जित कर दें लेकिन अगर वह योग्य और बुद्धिमान नहीं होगा तो माता-पिता की गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति को क्षण भर में नष्ट कर देगा।
इस संदर्भ में एक दोहा काफी प्रचलित है 'पुत्र कुपुत्र तो का धन संचय, पुत्र सुपुत्र तो का धन संचय' इस दोहा में कहा गया है कि संतान के मोह में उसके लिए किसी भी स्थिति में धन संपत्ति अर्जित करने की जरूरत नहीं है। संतान को अच्छी शिक्षा दीजिए और योग्य बनाईये। योग्य संतान अपनी क्षमता और बुद्घि से वह सब कुछ स्वयं अर्जित कर लेगा जो आप उसे अपनी जरूरतों के साथ समझौता करके भी नहीं दे सकते।
बच्चों की शिक्षा के मामले में किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहिए। शिक्षा के महत्व को समझाने के लिए ही प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मुनि ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा करते आ रहे हैं। प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा का तात्पर्य भी यही है कि मनुष्य शिक्षा के महत्व को समझे। जहां पर ज्ञान होता है वहीं लक्ष्मी अवश्य होती है। लेकिन जहां लक्ष्मी होती है वहां सरस्वती भी हो ऐसा आवश्यक नहीं है।
लक्ष्मी से संपन्न व्यक्ति अर्थात धनवान व्यक्ति तभी तक आदर पाता है जब तक उसके धन-वैभव को लोग देखते हैं। जिसके पास ज्ञान होता है वह खाली हाथ भी कहीं जाए तो उसकी वाणी और विद्या के कारण लोग उसकी पूजा करते हैं। जिस पर सरस्वती की कृपा होती है उस पर लक्ष्मी अवश्य ही कृपा करती है। इसलिए हर माता-पिता को अपने बच्चों को संसार का सबसे बड़ा धन ज्ञान प्रदान करने की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए।
नीतिशास्त्र में कहा गया है कि 'माता शत्रुः पिता वैरी, येन बालो न पाठितः' अर्थात वह माता पिता बच्चों के शत्रु हैं जो अपने बच्चों को शिक्षा प्रदान करने की उचित व्यवस्था नहीं करते हैं। भौतिक संपत्ति अर्जित कर देने मात्र से माता-पिता बच्चों के शुभचिंतक नहीं होते। शास्त्रों में ऐसा इसलिए कहा गया है क्योंकि बच्चों के लिए भले ही ढ़ेरों संपत्ति अर्जित कर दें लेकिन अगर वह योग्य और बुद्धिमान नहीं होगा तो माता-पिता की गाढ़ी कमाई से अर्जित संपत्ति को क्षण भर में नष्ट कर देगा।
इस संदर्भ में एक दोहा काफी प्रचलित है 'पुत्र कुपुत्र तो का धन संचय, पुत्र सुपुत्र तो का धन संचय' इस दोहा में कहा गया है कि संतान के मोह में उसके लिए किसी भी स्थिति में धन संपत्ति अर्जित करने की जरूरत नहीं है। संतान को अच्छी शिक्षा दीजिए और योग्य बनाईये। योग्य संतान अपनी क्षमता और बुद्घि से वह सब कुछ स्वयं अर्जित कर लेगा जो आप उसे अपनी जरूरतों के साथ समझौता करके भी नहीं दे सकते।
बच्चों की शिक्षा के मामले में किसी प्रकार का समझौता नहीं करना चाहिए। शिक्षा के महत्व को समझाने के लिए ही प्राचीन काल से हमारे ऋषि-मुनि ज्ञान की देवी सरस्वती की पूजा करते आ रहे हैं। प्रत्येक वर्ष बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा का तात्पर्य भी यही है कि मनुष्य शिक्षा के महत्व को समझे। जहां पर ज्ञान होता है वहीं लक्ष्मी अवश्य होती है। लेकिन जहां लक्ष्मी होती है वहां सरस्वती भी हो ऐसा आवश्यक नहीं है।
लक्ष्मी से संपन्न व्यक्ति अर्थात धनवान व्यक्ति तभी तक आदर पाता है जब तक उसके धन-वैभव को लोग देखते हैं। जिसके पास ज्ञान होता है वह खाली हाथ भी कहीं जाए तो उसकी वाणी और विद्या के कारण लोग उसकी पूजा करते हैं। जिस पर सरस्वती की कृपा होती है उस पर लक्ष्मी अवश्य ही कृपा करती है। इसलिए हर माता-पिता को अपने बच्चों को संसार का सबसे बड़ा धन ज्ञान प्रदान करने की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए।