मां के प्यार की मिसाल है इस 'हलवे' की कहानी
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माँ की ममता, माँ का प्यार। माता का हृदय कितना विशाल, कितना कोमल और मधुर होता है, बताया नहीं जा सकता। संतान के लिए उनके जैसा प्यार ममता और कोई लुटा ही नहीं सकता। माँ की ममता, माँ का प्यार। संतान को गढ़ने में प्रमुख भूमिका निभाती है। प्यार भी वही अधिक लूटाती है। आज एक ऐसी ही ममता भरी मां का महाप्रयाण दिवस है।
हम बात कर रहे हैं अखिलविश्व गायत्री परिवार की संस्थापिका माता भगवती देवी शर्मा की। 9 सितम्बर 1994 भाद्रपद पूर्णिमा-महालय को अपनी स्थूल यात्रा में उन्होंने चिर विराम लगा दिया। माँ भगवती से जुड़ी एक घटना आज भी उनकी ममता की याद दिलाती है। एक बार ममतामयी के लाड़लों ने हलवा खाने की जिद्द ठान ली। तब उनके पास हलवा के सभी सामान नहीं थे।
खासकरके शक्कर जैसे महत्त्वपूर्ण घटक, जिसके बगैर हलवा की कल्पना नहीं की जा सकती; तो कैसे बने हलवा? बच्चे खुश हो रहे थे-हलवा खाएंगे, हलवा खाएंगे। ममता सोच में पड़ गयी, फिर तरकीब निकाली, नमक से हलवा बनाया जाय।
हलवा बनकर परस लिया गया। उताबले बच्चे शौक से मुँह में डाले। पर ये क्या! नमकीन हलवा! सारा मजा किरकिरा हो गया। जितने उत्साह से हलवा उत्सव मना रहे थे, उतने ही निरुत्साहित हो गये। पर हृदय की धड़कन समझने वाली मौसम भांपकर बोलीं- ‘देखो, हलवा दो तरह का होता है-मीठा और नमकीन। हमने अभी नमकीन बनाया, कभी मीठा भी बना लेंगे, अभी तो जायका ले लो।’
हलवा बनाने का नया फार्मुला
पर हमने तो सुना था हलवा मीठा होता है!’ बच्चों ने सवाल किया। माँ चतुराई से बोली- ‘हां, होता है, लोग उसी को जानते हैं। पर हमने यह नये फार्मुले से बनाया है, जिसका मजा सिर्फ तुम्हीं ले सकते हो। पूछो कैसे? वह ऐसे कि दूसरों को पता ही नहीं तो बनाएंगे कैसे? यह सिर्फ हमारे पास है, यानि तुम्हारे पास, नये फार्मुले का हलवा, बस मजा लो और बताओ, कैसा लगा?’
बच्चों को नए सामानों में स्वाभाविक रुचि होती है। फिर माँ दे रही है, जो श्रद्धा-विश्वास की सबसे पहली और सबसे आखिरी मूर्ति है। उन्होंने सोचा, ‘नया है तो अच्छा होना ही चाहिए, चलो खाते हैं।’ अब नमक भी शहद बन गया। वे खुश होकर खाने लगे, तारीफ भी करते गए। क्या है ये? प्यार का पारिजात जो मरूभूमि को भी महका देता है। आज भी उसका जवाब गायत्री पारिवार से जुड़े लाखों करोड़ों बच्चे देते हैं पर उनका वह हलवा ऐसा मीठा निकला, जिसका स्वाद लेने के लिए करोड़ों परिजनों का परिवार लाइन लगाकर खड़ा हो गया।
आज हरिद्वार जाने वाले प्रत्येक यात्री शांतिकुंज अवश्य पहुंचता है और शांतिकुंज के माँ भगवती भोजनालय का प्रसाद अवश्य सेवन करता है। माँ की ममता का अमृत यहाँ हर कोई पाता है।
(प्रस्तुति- शान्तिकुंज फीचर्स, हरिद्वार)