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जहां चाहें वहां मिल सकता है गंगा स्नान का पुण्य
राकेश/इंटरनेट डेस्क।
Updated Wed, 23 Jan 2013 02:13 PM IST
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कि गंगा स्नान करने से पाप धुल जाते हैं और उत्तम लोक में स्थान मिल जाता है। इस
मान्यता के कारण लोग दूर-दूर से गंगा तट पर आकर स्नान ध्यान करते हैं। जबकि गंगा का
जल बाढ़ के दौरान दूसरी नदियों में भी मिल जाता है लेकिन उस नदी को हमारा मन गंगा
के रूप में स्वीकार नहीं करता है। इसलिए लंबी और कष्टप्रद यात्रा करके भी हम गंगा
तट पर पहुंचना चाहते हैं।
जबकि कहा जाता है कि गंगा का एक बूंद जल जिस जल में मिल जाता है वह जल भी गंगा जल के समान होता है। हम अगर अपने घर के पास की नदी को भी गंगा जल मान लें तो वह भी हमें गंगा स्नान का पुण्य दे सकता है क्योंकि, गंगा भी अन्य नदियों की तरह है एक नदी है। गंगा स्नान से पाप नहीं धुलता है और न तो मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वास्तव में गंगा हमारी भावनाओं में बसी है। कहा जाता है कि जैसी भावना होती है फल उसी प्रकार मिलता है। जब हम गंगा को माता मानकर पवित्र भाव से गंगा की डूबकी लगाते हैं तब गंगा भी हमारी भावना को सम्मान देती है और हमें उसका सकारात्मक प्रतिफल प्राप्त होता है। गंगा तट पर रहने वाले पशु पक्षी गाहे-बगाहे गंगा में डुबकी लगा लेते हैं।
गंगा की पवित्र धारा का जल भी पीते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं होता है कि वह गंगा में डुबकी लगा रहे हैं और गंगा जल पी रहे हैं। इसलिए उन्हें गंगा स्नान और गंगाजल पान का पुण्य नहीं मिल पाता है। वास्तव में पुण्य हमारी भावनाओं का प्रतिफल होता है। हम जहां भी स्नान करें जिस जल से स्नान करें उसमें गंगा जल की कुछ बूंदें मिला दें तो उसी जल से गंगा स्नान का पुण्य मिल जाता है। वास्तव में पुण्य और पाप हमारी भावनाओं का प्रतिफल होता है।
भावना का ही प्रतिफल है कि कोई पत्थर भगवान बन जाता है। हमारी भावना और आस्था के कारण ही एक पत्थर हमें आत्मबल और सकारात्मक उर्जा प्रदान करने लगता है और हम पत्थर के प्रति अटूट श्रद्धा रखने लगते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि निराकार ब्रह्म की उपासना कठिन है लेकिन ब्रह्म को साकार रूप दिया जाए तो उसमें ध्यान केन्द्रित करना आसान होता है। इसलिए ही पत्थर को, मिट्टी के पिण्ड को, मानव रूप में शिव, विष्णु, राम, कृष्ण की मूर्ति की हम पूजा करते हैं।
गीता में ही भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा है कि जो व्यक्ति उन्हें जिस भाव और जिस रूप में पूजता है वह उसी भाव और रूप में उनके सामने प्रत्यक्ष हो जाते हैं। इसलिए आत्मशुद्घि के लिए गंगा स्नान की जरूरत नहीं है अपनी भावनाओं को शुद्ध करने की जरूरत है फिर हम आप जहां चाहेंगे वहीं गंगा स्नान का फल मिल जाएगा।
जबकि कहा जाता है कि गंगा का एक बूंद जल जिस जल में मिल जाता है वह जल भी गंगा जल के समान होता है। हम अगर अपने घर के पास की नदी को भी गंगा जल मान लें तो वह भी हमें गंगा स्नान का पुण्य दे सकता है क्योंकि, गंगा भी अन्य नदियों की तरह है एक नदी है। गंगा स्नान से पाप नहीं धुलता है और न तो मोक्ष की प्राप्ति होती है।
वास्तव में गंगा हमारी भावनाओं में बसी है। कहा जाता है कि जैसी भावना होती है फल उसी प्रकार मिलता है। जब हम गंगा को माता मानकर पवित्र भाव से गंगा की डूबकी लगाते हैं तब गंगा भी हमारी भावना को सम्मान देती है और हमें उसका सकारात्मक प्रतिफल प्राप्त होता है। गंगा तट पर रहने वाले पशु पक्षी गाहे-बगाहे गंगा में डुबकी लगा लेते हैं।
गंगा की पवित्र धारा का जल भी पीते हैं लेकिन उन्हें यह पता नहीं होता है कि वह गंगा में डुबकी लगा रहे हैं और गंगा जल पी रहे हैं। इसलिए उन्हें गंगा स्नान और गंगाजल पान का पुण्य नहीं मिल पाता है। वास्तव में पुण्य हमारी भावनाओं का प्रतिफल होता है। हम जहां भी स्नान करें जिस जल से स्नान करें उसमें गंगा जल की कुछ बूंदें मिला दें तो उसी जल से गंगा स्नान का पुण्य मिल जाता है। वास्तव में पुण्य और पाप हमारी भावनाओं का प्रतिफल होता है।
भावना का ही प्रतिफल है कि कोई पत्थर भगवान बन जाता है। हमारी भावना और आस्था के कारण ही एक पत्थर हमें आत्मबल और सकारात्मक उर्जा प्रदान करने लगता है और हम पत्थर के प्रति अटूट श्रद्धा रखने लगते हैं। गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है कि निराकार ब्रह्म की उपासना कठिन है लेकिन ब्रह्म को साकार रूप दिया जाए तो उसमें ध्यान केन्द्रित करना आसान होता है। इसलिए ही पत्थर को, मिट्टी के पिण्ड को, मानव रूप में शिव, विष्णु, राम, कृष्ण की मूर्ति की हम पूजा करते हैं।
गीता में ही भगवान श्री कृष्ण ने यह भी कहा है कि जो व्यक्ति उन्हें जिस भाव और जिस रूप में पूजता है वह उसी भाव और रूप में उनके सामने प्रत्यक्ष हो जाते हैं। इसलिए आत्मशुद्घि के लिए गंगा स्नान की जरूरत नहीं है अपनी भावनाओं को शुद्ध करने की जरूरत है फिर हम आप जहां चाहेंगे वहीं गंगा स्नान का फल मिल जाएगा।