सीख: मुनाफे पर खुश और घाटा होने पर दुखी नहीं होना चाहिए
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एक नदी के किनारे एक खूबसूरत गांव था। उस गांव में जाने के लिए नाव का उपयोग करना पड़ता था। मोहन उसी गांव में रहना वाला एक व्यवसायी था। उसके पास एक नाव थी। उस नाव के लिए कई लोग बोलियां लगा चुके थे, लेकिन मोहन उसे कभी बेचना नहीं चाहता था। एक दिन जब वह अपने काम से लौटा, तो देखा कि नाव डूब रही थी। मोहन यह देखकर गला फाड़-फाड़कर चिल्लाने लगा। उसकी चीख सुनकर उसका छोटा बेटा आया और बोला, पिता जी आप क्यों रोते हो। मैंने कल ही नाव का सौदा एक सेठ से कर लिया था। अब तो वह नाव हमारी है ही नहीं। मोहन एकदम से चुप हो गया, फिर बेटे की पीठ थपथपाई और मुस्कराने लगा।
तब तक पीछे से मोहन का मंझला बेटा आया और बोला, पिता जी, आपकी नाव डूब रही है और आप मुस्करा रहे हैं। मोहन ने छोटे बेटे और सेठ के बीच हुई बातचीत का ब्योरा देते हुए कहा, जो चीज हमारी नहीं, उस पर क्या रोना! तभी मंझला बेटा बोला, अरे नहीं पिता जी, वह सौदा तो कल ही सेठ ने मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें कोई और नाव मिल गई थी। मोहन ने बेटे की बात सुनकर अपना सिर पकड़ लिया और फिर दहाड़ें मारकर रोने लगा।
कुछ ही देर में मोहन का सबसे बड़ा बेटा वहां आया और मोहन को देखकर हंसने लगा। मोहन ने पूछा, क्यों हंस रहे हो तुम? बड़ा बेटा बोला, जिस नाव को देखकर आप रो रहे हैं, उसमें तो कल रात ही छेद हो गया था। एक दूसरी नाव से टक्कर होने की वजह से उसका पिछला हिस्सा टूट गया था और उसमें पानी घुसने लगा था। जिस नाव वाले ने ठोकर मारी थी, उसने नाव की पूरी कीमत अदा की है, पैसे मां के पास हैं। मोहन सोचने लगा कि उसके भाव कैसे लगातार बदल रहे हैं। नाव तो डूब रही थी, पर डूबती नाव को देखकर कभी वह दुखी हो रहा था, कभी खुश और फिर दुखी। मोहन समझ गया कि यह सब नजरिये का खेल है। नजरिया बदलते ही उसके भाव भी बदलते जा रहे थे।