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दिवाली विशेष: आपकी राह कौन-सी है ?
Fri, 25 Oct 2019 08:46 AM IST
विनोद शुक्ला
स्वामी रामनरेशाचार्य
स्वामी रामनरेशाचार्य
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Fri, 25 Oct 2019 08:46 AM IST
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diwali
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अपनी विजय यात्रा में अकेला जलता दीया एक बार कार्तिक की रात्रि में विजय-पर्व का मनोरम रूप धारण करता है, क्योंकि अमावस्या की रात में ही दुर्दम्य अंधकार को भगाने में प्रकाश की सबसे ज्यादा उपयोगिता होती है। दीपक का जन्म एक लोकोत्सव बन जाता है। इसकी लौ में अनेक मिथक, प्रतीक और बिंब जुट जाते हैं मानो आदमी और दीये का मनोभाव एकाकार होकर स्नेह-श्रद्धा, लोक-परलोक और मृण्मय-चिन्मय की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ कैवल्य में तिरोहित हो जाता है।
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रावण की पराजय के बाद विजय-श्री धारण करके राम के अयोध्या लौटने की बात हो, यमराज की पूजा कर अकाल मृत्यु से बचने की लालसा हो, स्वस्थ रहते हुए सौ साल जीने की कामना हो, चौदहवीं की रात में नरकासुर के वध का आनंद हो, सागर से लक्ष्मी के प्रकट होने की खुशी हो, गोवर्धन की उपासना हो, भाई-बहन के शुचि संबंधों की बेला हो, ये सब इसी दीये की लौ में निर्बाध रूप से प्रकाशित हैं।
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श्रीराम एक अकिंचन वनवासी से उपेक्षित युवक के रूप में अकेले दीये की भांति कांटे-कुश, कांकड़-पाथर भरे बीहड़ वन में अपने साहस की लौ जलाते घूमते हैं। निर्मम, आततायी समग्र आंध्रालय के एकछत्र सम्राट रावण से लोहा लेते हैं। अपने बूते अनगढ़, अशिक्षित जनजातियों का एक सुसंस्कृत समाज बनाते हैं और लंका विजय के बाद अपनी विजय का श्रेय बानर, रीछों में बांटते हैं। यह दूसरों को श्रेय देने की परंपरा देवताओं की निशानी है। यह स्वार्थ का पथ नहीं है। स्वार्थ के रास्ते पर तो हम दूसरों को दुखी देखकर ही सुख महसूस करते हैं। स्वार्थ के वश होकर ही अगर एक राष्ट्र दूसरे पर हमला कर दे तो? परिणाम की कल्पना ही भयानक होगी। इस तरह मानव की सभ्यता, संस्कृति एवं जीवन के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लग जाएगा।
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विगत दो महायुद्धों में करीब दस करोड़ लोगों की हत्या की गई। विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन से एक बार किसी पत्रकार ने पूछा कि तीसरे महायुद्ध में पृथ्वी का क्या होगा ? आइंस्टीन ने कहा कि तीसरे महायुद्ध के बारे में तो नहीं बता सकता, परंतु चौथे महायुद्ध के बारे में अवश्य बता सकता हूं। पत्रकार के पूछने पर आइंस्टीन ने उत्तर दिया, "चौथा महायुद्ध होगा ही नहीं, क्योंकि तीसरे महायुद्ध में इतना विनाश होगा कि चौथे महायुद्ध के लिए कोई बचेगा ही नहीं।"
ऐसी जीवन शैली या सभ्यता, संस्कृति और शिक्षा किस काम की जिसमें मनुष्य की सभ्यता और जीवन ही विनाश के कगार पर खड़ा हो। भौतिक जगत में मानव ने चाहे जितनी प्रगति कर ली हो, किंतु सात्विक चिंतन, भावनात्मक एकता और आध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में मानव विनाश का ही आज भीषण खतरा बना हुआ है। मानव की उत्पत्ति को हजारों वर्ष गुजर चुके हैं, फिर भी अभी तक वह जंगली जानवरों की तरह खून का प्यासा है। विश्वविख्यात नाटककार बर्नाड शॉ ने एक जगह कहा था कि मानव का निर्माण करने का प्रयोग असफल रहा, ऐसा समझकर एक दिन ईश्वर समूची मानव जाति को ही समाप्त कर देगा। निराशा के कारण हमें ऐसा लगता है, किंतु ईश्वर का प्रेम स्वार्थी नहीं है, वह अब भी आस लगाए हुए है कि मानव जाति एक दिन सही मार्ग पर आ जाएगी।
सुकरात मनुष्य के सद्गुणों को ही ज्ञान मानते थे। गीता के अनुसार ज्ञान का अर्थ पंडिताई या पुस्तकीय विद्या नहीं है। ज्ञान का अर्थ है सद्गुण। ऐसी शिक्षा जो मनुष्य में सद्गुणों की खान उत्पन्न कर सके वही सच्ची शिक्षा है। भारतीय संस्कृति के मूल में ऐसे उदात्त विचारों की रसधारा आज भी है। वर्तमान युग की प्रतिस्पर्धा और विषम परिस्थितियों में भी यह धारा सूखने नहीं पाई हैं। आशा की जा सकती है कि अंततोगत्वा ऐसी मानव सभ्यता का उदय होगा, जिसमें जाति, धर्म, संप्रदाय एवं देश की सीमाओं को तोड़कर समूची मानव जाति में एकरूपता, परस्पर प्रेम, करुणा, सहिष्णुता आदि संजोए उच्च मानव धर्म का प्रादुर्भाव हो। तभी यह पृथ्वी इंसान के जीने योग्य बन सकेगी और हमें अपने आपको मानव कहे जाने पर गर्व होगा।