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भावनाओं, शरीर के अंगों और पोषण के बीच आयुर्वेदिक संबंध की खोज

कौस्तुभ शर्मा, नई दिल्ली Published by: रुस्तम राणा Updated Mon, 06 Sep 2021 03:38 PM IST

सार

आयुर्वेद के अनुसार, प्राणवायु और तर्पण खांसी सिर क्षेत्र में स्थित है। प्राण वायु साँस लेने और छोडने के लिए जिम्मेदार है और इसीलिए प्राणायाम मस्तिष्क को प्रभावित करता है। अध्ययनों से पता चलता है कि मस्तिष्क की उम्र बढने में देरी करने पर प्राणायाम के जबरदस्त लाभ है।
मस्तिष्क और भावनाएं: मस्तिष्क मानव शरीर के सबसे बडे और सबसे जटिल अंगों में से एक है।
मस्तिष्क और भावनाएं: मस्तिष्क मानव शरीर के सबसे बडे और सबसे जटिल अंगों में से एक है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

एक लोकप्रिय कहावत है- जैसा अन्न वैसा मन- जिसका अर्थ है कि आप जो खाते हैं वही आपके दिमाग का होता है। इस विश्व पोषण सप्ताह, आइए हम आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री तत्व पंचकर्म केंद्र में जीवन शैली विकारों के आयुर्वेदिक उपचार के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ अभिषेक कुमार से भोजन, शरीर के अंगों और भावनाओं के अल्पज्ञात संबंध को समझतें हैं।


 
शरीर के अंग का भावनाओं से संबंध 
वैश्विक आध्यात्मिक शिक्षक और मानवतावादी, गुरूदेव श्री श्री रविशंकर कहते हैं, "एक मजबूत दिमाग एक कमजोर शरीर को संभाल सकता है, लेकिन एक कमजोर दिमाग एक मजबूत शरीर को नही संभाल सकता।" मस्तिष्क और भावनाएं: मस्तिष्क मानव शरीर के सबसे बडे और सबसे जटिल अंगों में से एक है। यह 100 अरब से अधिक तंत्रिकाओं से बना है जो अरबों जोडों संचार करता है, जिन्हें सिनैप्सिस कहा जाता है।


आयुर्वेद के अनुसार, प्राणवायु और तर्पण खांसी सिर क्षेत्र में स्थित है। प्राण वायु साँस लेने और छोडने के लिए जिम्मेदार है और इसीलिए प्राणायाम मस्तिष्क को प्रभावित करता है। अध्ययनों से पता चलता है कि मस्तिष्क की उम्र बढने में देरी करने पर प्राणायाम के जबरदस्त लाभ है। मस्तिष्क से संबंधित भावनाएँ जैसे भय, खुशी, प्रेम, क्रोध, चिंता, शांति और कृतज्ञता हैं, और नकारात्मक भावनाएँ जैसे चिंता, गम, भ्रम और जडता हैं। 

योग विज्ञान के अनुसार चौथा चक्र यानि अनाहत चक्र हृदय क्षेत्र से जुड़ा है।
योग विज्ञान के अनुसार चौथा चक्र यानि अनाहत चक्र हृदय क्षेत्र से जुड़ा है। - फोटो : सोशल मीडिया
उपाय: ध्यान, साँस लेने की तकनीक, सिर की मालिश- शिलोधारा, नस्य तकनीक, मेवा और बीज का सेवन, भ्रामी और शंखपुष्पी मस्तिष्क के कार्य को बेहतर बनाने और मस्तिष्क से संबंधित इन नकारात्मक भावनाओं को दूर करने में मदद कर सकता है। पिट्युटरी ग्रंथि को मास्टर ग्रंथि कहा जाता है।

शिरोधारा एक ऐसी तकनीक है जिसमें लगभग 30-40 मिनट तक माथे पर तेल डाला जाता है, जिससे बहुत शांति मिलती है और अनिद्रा का इलाज होता है। आयुर्वेद कहता है कि नाक मस्तिष्क का प्रवेश द्वार है। नस्य एक ऐसी तकनीक है, जहां केवल नाक में तेल डाला जाता है। यह मनोदैहिक विकारों को ठीक करने में मदद करता है। 
 
हृदय: योग विज्ञान के अनुसार चौथा चक्र यानि अनाहत चक्र हृदय क्षेत्र से जुड़ा है। प्राण वायु और साधक पित्त (एक प्रकार का पित्त या अग्नि तत्व) भी इसी भाग में स्थित हैं। रक्त के प्रवाह को कुछ भावनाओं से भी जुड़ा बताया गया है। इस क्षेत्र से संबंधित भावनाएँ जैसे प्रेम, देखभाल, खुशी, उदासीन, आनंद, आश्चर्य, विचारशीलता हैं।

यदि आप नकारात्मक भाव रखते हैं, तो हृदय प्रभावित होता है और आपके दिल में जलन, सीने में दर्द, कोरोनरी धमनी की बीमारी, दिल का दौरा, उच्च रक्तचाप और तनाव हो सकता है। इन भावनाओं से निपटने का सबसे अच्छा तरीका ध्यान है या आप अनुलोमविलोम प्राणायाम का अभ्यास कर सकते हैं। बादाम, अखरोट, गाय का दूध, साबुत अनाज का सेवन कर सकते हैं। आयुर्वेदिक चिकित्सा- अर्जुन और त्रिफला हृदय क्षेत्र में भावनाओं को संतुलित करने के लिए सबसे अच्छा काम करता है।
 
जिगर और पित्ताशय: आयुर्वेद के अनुसार जिगर पित्त के लिए एक स्थान है और चयापचय, वसा के भंडारण, आपके शर्करा को संतुलित करने, आपके सिस्टम को डिटॉक्सीफाई करने के लिए जिम्मेदार है। यहां अग्नि और जल तत्वों का प्रभुत्व है। इस क्षेत्र को प्रभावित करने वाली भावनाएं हैं क्रोध, चिंता, हताशा, कटुता, अति महत्वाकांक्षा और जलन।

यहां असंतुलन से सिरदर्द, थकान, त्वचा संबंधी समस्याएं, घूस, कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली, कब्ज आदि होता है। उपाय: पित्त दोष (अग्नि तत्व) को संतुलित करें, खूब पानी पिएं, मीठे फल, पत्तेदार सब्जियां, अदरक, सौंफ, धनिया और काले करंट का सेवन करें।

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
फेफड़े: वे श्वसन प्रणाली का हिस्सा हैं और इस क्षेत्र में दो जैव ऊर्जा- वात (वायु तत्व) और कफ (पृथ्वी और जल तत्व) मौजूद हैं। फेफड़ों को प्रभावित करने वाली भावनाएँ दु:ख, उदासी, अवसाद हैं। इससे खांसी, कंजेशन, सांस फूलना, दर्द होना, प्रतिरोधक क्षमता कम हो सकती है। सांस लेने का व्यायाम, भस्त्रिका प्राणायाम, सांस को तेज करना, इलायची, काली मिर्च, अंगूर, अदरक, खूबानी का नियमित रूप से सेवन करके इन भावनाओं को सुधारा जा सकता है।
 
गर्भाशय: यह भ्रूण के पोषण में मदद करता है। भावनाओं का दमन स्त्री रोग संबंधी समस्याओं का कारण बन सकता है। गर्भाशय को प्रभावित करने वाली भावनाएँ जैसे, असुरक्षा, अनिश्चितता, अपराधबोध या आघात हैं। इससे अनियमित मासिक धर्म चक्र, ऐंठन, पीसीओडी, फाइब्रॉएड, भारी रक्तस्राव हो सकता है। इन भावनाओं पर काबू पाने का सबसे अच्छा तरीका योग (butterfly pose) और ध्यान है। अपनी भावनाओं को व्यक्त करना, व्यायाम, पद्मासन (आसनों का क्रम) और इलायची, अदरक, शतावरी, ब्राह्मी, शंखपुष्पी और शिरोधारा तकनीक का सेवन लाभकारी होता है।
 
किडनी और ब्लैडर: ये अंग शरीर में तरल पदार्थ को संतुलित करते हैं। इस क्षेत्र में वात और कफ दोष स्थित हैं। गुर्दा, रक्त से खनिजों को विनियमित और छानने और अपशिष्ट को हटाने में मदद करता है। यह हड्डियों के स्वास्थ्य और रक्तचाप के नियमन को बनाए रखता है। इस क्षेत्र से संबंधित भावनाएँ हैं– भय, कमजोर इच्छाशक्ति, अकेलापन, अलगाव और असुरक्षा। ये बार-बार पेशाब आना, यूटीआई (यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन), किडनी स्टोन, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, बालों का झड़ना और रात को पसीना आने से संबंधित हैं।
 
उपाय: - हाइड्रेटेड (जल-योजित) रहें, लहसुन और प्याज, सेब, स्ट्रॉबेरी, अंगूर, तुलसी, पुनर्नवा, अनार और राजमा का सेवन करें। धूम्रपान और शराब से बचें।
 
घुटने का जोड़: यह लचीलेपन और विस्तार और हालचाल के लिए जिम्मेदार है।
 
घुटने के जोड़ों को प्रभावित करने वाली भावनाएँ - हठ, अनम्यता, प्रेम का अभाव
उपाय- नियमित व्यायाम, संतुलित पोषण, प्रकृति में लचीलापन, हल्दी, अश्वगंधा, गाय का घी, सहजन, अजवाइन का सेवन करें।
 
अन्य अंग और उनके भाव संबंध
प्लीहा - चिंता और घबराहट - छोटे बच्चे वाली माताएँ हमेशा चिंतित रहती हैं। कूल्हे - भय, उदासी, चिंता; त्वचा - क्रोध, तनाव;  निचली पीठ - रिश्ते की समस्याएं और चिंता, असुरक्षा; पेट - घबराहट और चिंता; बड़ी आंत - दु:ख और चिंता; छोटी आंत - खुशी और आनंद; अग्न्याशय - भय, अपराधबोध, निराशा।
 
इन भावनाओं को दूर करने के उपाय
स्थिति को स्वीकार करना, अपना आहार, विहार, विचार, ध्यान, मंत्र जप, पंचकर्म, व्यायाम, जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण रखना, सत्त्व बढ़ाना, अभिव्यक्ति का मार्ग खोजना।
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